धर्म में श्रद्धा जीवन को देती है शांति और समभाव : मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’

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जयपुर :  धर्म के प्रति श्रद्धावान होना जीवन का परम सौभाग्य है। धार्मिक श्रद्धा अत्यंत दुर्लभ होती है और यह आत्मनिर्मलता से प्राप्त होती है। श्रद्धा व्यक्ति को सत्य के प्रति जागरूक करने के साथ जीवन में शांति, समभाव और सहनशीलता का भाव विकसित करती है। यह विचार मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने मंगलवार को अणुविभा केन्द्र, मालवीय नगर में व्यक्त किए।

तेरापंथ महिला मंडल (शहर) के तत्त्वावधान में आयोजित सामूहिक आयंबिल तप एवं ‘धार्मिक श्रद्धा क्यों जरूरी’ विषयक विशेष आयोजन में मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ एवं मुनिश्री संभव कुमार जी महाराज का सानिध्य प्राप्त हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ने आगम शास्त्र के संदर्भों के माध्यम से धार्मिक श्रद्धा की महत्ता समझाते हुए कहा कि जैन दर्शन में मोहनीय कर्म के दो प्रमुख प्रकार बताए गए हैं—दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय। जब व्यक्ति के दर्शन मोह का विलय होता है, तब वह सत्य को जानकर उसके प्रति श्रद्धा करता है। यही श्रद्धा जीवन को सही दिशा प्रदान करती है।

उन्होंने कहा कि श्रद्धा संकट की घड़ी में संबल बनती है। श्रद्धावान व्यक्ति बाहरी परिस्थितियों से विचलित नहीं होता, बल्कि आने वाले कष्टों को भी प्रसन्नता और समभाव के साथ सहन करने की क्षमता रखता है। ‘सहन करना मेरा धर्म है’—यह भाव धार्मिक चेतना से ही जन्म लेता है। शांत और समाधिमय जीवन के लिए धार्मिक श्रद्धा अत्यंत आवश्यक है।

मुनिश्री संभव कुमार जी महाराज ने कहा कि जीवन में आकर्षण के दो प्रमुख केंद्र हैं—त्याग और भोग। धर्म में श्रद्धा रखने वाले व्यक्ति को त्याग और वैराग्य आकर्षित करते हैं, जबकि श्रद्धाहीन व्यक्ति संसार के राग-रंग और काम-भोग की ओर अधिक आकर्षित होता है। ऐसे व्यक्ति में धर्म और ध्यान के प्रति रुचि के स्थान पर अरुचि उत्पन्न हो जाती है।

कार्यक्रम का शुभारंभ पवित्र स्तुति गान से हुआ। इसके पश्चात जप, तप, ध्यान एवं तत्त्वज्ञान से जुड़े आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। आयोजन के दौरान तेरापंथ महिला मंडल (शहर) के तत्त्वावधान में सामूहिक आयंबिल तप भी संपन्न हुआ।

आयोजन ने श्रद्धालुओं को धर्म, तप और आत्मचिंतन के माध्यम से जीवन में शांति, संयम और समभाव को अपनाने की प्रेरणा दी।