अत्यंत दुर्लभ है संयम में पराक्रम : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं :अहिंसा यात्रा प्रणेता युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के पावन सान्निध्य में दिनांक 1 से 7 अक्टूबर तक आयोजित किए जा रहे अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के क्रम में प्रतिदिन मानवीय मूल्यों और संयम का संदेश जन-जन तक पहुँचाया जा रहा है। सप्ताह के प्रथम दिन ‘अणुव्रत चेतना दिवस’, द्वितीय दिन महात्मा गांधी जयंती पर ‘अहिंसा दिवस’ तथा तृतीय दिन सर्वधर्म समभाव का प्रसार करते हुए ‘सांप्रदायिक सौहार्द दिवस’ का आयोजन किया गया। इसी श्रृंखला में आज चौथा दिन ‘पर्यावरण शुद्धि दिवस’ के रूप में मनाया गया। इस पावन पर आचार्यश्री ने पर्यावरण संरक्षण को जीवन शैली और आंतरिक संयम से जोड़ते हुए पाथेय प्रदान किया।

धर्मसभा को संबोधित करते हुए युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने कहा कि दुनिया में चार चीजें परम दुर्लभ हैं – मनुष्यत्व, धर्म श्रवण, श्रद्धा और संयम में पराक्रम। चौरासी लाख जीव योनियों में भटकते हुए अनंत-अनंत काल बीत जाने पर भी जीवों को मनुष्य जन्म नहीं मिल पाता। हमें यह मानव जीवन उपलब्ध हुआ है, यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसी प्रकार धर्म श्रवण भी दुर्लभ है। सभी में धर्म सुनने की इच्छा या रुचि हो जरूरी नहीं। लोग आलस्य या संतों के प्रति अनासक्ति के कारण प्रवचन में जाने से कतराते हैं, जबकि साधु-संतों के पास एक घंटा बैठकर सुनना भी जीवन के लिए अत्यंत लाभकारी है। इससे सावद्य कार्यों से निवृत्ति मिलती है और मन पवित्र व शुभ रहता है। इसके साथ ही निर्ग्रन्थ प्रवचन पर सच्ची श्रद्धा होना भी बहुत दुर्लभ है। यदि श्रद्धा जाग जाए, तो चौथी दुर्लभ चीज संयम के मार्ग पर पराक्रम करना। गृहस्थों की धर्म के प्रति श्रद्धा होने पर भी कई बार पारिवारिक या सांसारिक परिस्थितियों के कारण वे धर्माचरण नहीं कर पाते। लेकिन जिनमें मुमुक्षुत्व जागृत हो जाए और वे संयम जीवन अपना लें, वह बड़े भाग्य की बात है। महापुरुषों के सानिध्य में रहने का सुयोग मिलना जीवन-विकास का बड़ा निमित्त बनता है, लेकिन व्यक्ति अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार ही उसका लाभ उठा पाता है।

आचार्यश्री ने अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के अंतर्गत ‘पर्यावरण शुद्धि दिवस’ के संदर्भ में कहा – जीवन में अहिंसा, संयम और तप की त्रिवेणी निरंतर बहनी चाहिए। अहिंसा की चेतना केवल सिद्धांतों में नहीं, हमारे दैनिक कार्यों और व्यवहार में संयम के रूप में उतरनी चाहिए। अनावश्यक चीजों का उपयोग न करना ही सच्चा संयम है। बिजली का भी अनावश्यक उपयोग ना हो ताकि ऊर्जा की बचत के साथ-साथ रात्रि में जीव-जंतुओं की हिंसा से भी बचा जा सके। इसी प्रकार जल का विवेक और संयम बहुत आवश्यक है। अन्यवश्यक रूप से पानी व्यर्थ बहाने से बचना चाहिए। जीवन शैली सादगीपूर्ण होनी चाहिए। बाहर की चकाचौंध या बहुत कीमती कपड़ों, महंगे चश्मे, घड़ी जैसे भौतिक पदार्थों की लालसा से बचना चाहिए। भौतिक पदार्थों के संग्रह से बचकर अहिंसा, संयम और तप का संचय करना ही अंत में सार्थक सिद्ध होता है।

इस अवसर पर हर्षिता किशोर जी मनोत जोधपुर ने 27 दिन की तपस्या मासखमण का प्रत्याख्यान किया।