एआई के इस्तेमाल पर टैक्स लगाने का सुझाव, रघुराम राजन ने बताई वजह

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डेस्क : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई तेजी से कारोबार और रोजगार की दुनिया को बदल रहा है। कंपनियां एआई की मदद से कम समय में अधिक काम पूरा कर रही हैं और उत्पादकता बढ़ा रही हैं। हालांकि, इंसानों की जगह मशीनों के इस्तेमाल से नौकरियों पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता भी बढ़ रही है। इसी बीच भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कंपनियों के एआई इस्तेमाल पर टैक्स लगाने का सुझाव दिया है।

राजन ने प्रोजेक्ट सिंडिकेट में प्रकाशित अपने लेख ‘How Corporations Can Mitigate an AI Jobocalypse’ में कहा है कि सरकार एआई के इस्तेमाल पर शुरुआती दौर में कम दर का टैक्स लगाने पर विचार कर सकती है। खासतौर पर उन मामलों में, जहां कंपनियां इंसानों से कराया जाने वाला काम एआई के जरिए कराने लगती हैं।

इंसान और मशीन के बीच आर्थिक अंतर पर चिंता

राजन के मुताबिक, किसी कर्मचारी को नौकरी देने पर कंपनी को वेतन के अलावा सोशल सिक्योरिटी और रोजगार से जुड़े अन्य खर्च भी उठाने पड़ते हैं। इसके मुकाबले एआई के जरिए वही काम कराने में कंपनियों पर इस तरह की लागत नहीं आती। ऐसे में कर्मचारियों की जगह एआई को अपनाना कंपनियों के लिए आर्थिक रूप से अधिक आकर्षक हो सकता है।

उनका मानना है कि एआई टैक्स का उद्देश्य कंपनियों को तकनीक अपनाने से रोकना नहीं होना चाहिए, बल्कि इंसानों और मशीनों के बीच पैदा हो रहे आर्थिक असंतुलन को कम करना होना चाहिए।

एआई टोकन पर लग सकता है टैक्स

राजन ने सुझाव दिया है कि सरकार एआई के इस्तेमाल से जुड़े ‘टोकन’ पर शुरुआत में कम दर से टैक्स लगा सकती है। एआई के रोजगार पर पड़ने वाले वास्तविक प्रभाव को समझने के बाद इसकी दर में बदलाव किया जा सकता है। हालांकि, टैक्स इतना अधिक नहीं होना चाहिए कि कंपनियां एआई को अपनाने से ही पीछे हट जाएं।

उन्होंने यह भी कहा कि इस व्यवस्था में विदेशी एआई कंपनियों को शामिल करना जरूरी होगा, ताकि घरेलू कंपनियों पर ही इसका बोझ न पड़े।

अभी बड़े पैमाने पर नहीं हुआ एआई का इस्तेमाल

राजन के मुताबिक, एआई के कारण नौकरियों पर असर पड़ सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अचानक लाखों-करोड़ों नौकरियां खत्म हो जाएंगी। असली चुनौती एआई को अपनाने की रफ्तार और उसके प्रभाव को समझने की है।

उन्होंने अमेरिकी Census Business Trends and Outlook Survey का हवाला देते हुए बताया कि 20 से अधिक कर्मचारियों वाली करीब 20 फीसदी कंपनियां एआई का इस्तेमाल कर रही थीं। वहीं, 250 से अधिक कर्मचारियों वाली कंपनियों में यह आंकड़ा करीब 37 फीसदी था। इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में कंपनियां अभी भी एआई को समझने, उसका परीक्षण करने और उसे अपने कारोबार में शामिल करने के चरण में हैं।

हालांकि, प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ कंपनियों पर एआई अपनाने का दबाव भी बढ़ सकता है।

भारत के लिए चुनौती और अवसर दोनों

भारत के लिए एआई और रोजगार की यह बहस विशेष महत्व रखती है। देश का आईटी और सर्विस सेक्टर बड़ी संख्या में तकनीकी और बैक-ऑफिस काम पर निर्भर है। राजन के अनुसार, भारत को अपनी कम लागत और कुशल कर्मचारियों की वजह से शुरुआती दौर में कुछ फायदा मिल सकता है।

लेकिन लंबे समय में एआई का बढ़ता इस्तेमाल भारतीय कंपनियों और कर्मचारियों के सामने नई चुनौती खड़ी कर सकता है। ऐसे में री-स्किलिंग और अप-स्किलिंग यानी कर्मचारियों को नई तकनीक के मुताबिक प्रशिक्षित करना बेहद जरूरी होगा।

कर्मचारियों की ट्रेनिंग के लिए प्रोत्साहन की वकालत

राजन ने सरकार को केवल एआई टैक्स लगाने तक सीमित रहने के बजाय कंपनियों को प्रोत्साहन देने का भी सुझाव दिया है। उनका कहना है कि जो कंपनियां तकनीकी बदलाव के कारण प्रभावित होने वाले कर्मचारियों को नई ट्रेनिंग देती हैं और उन्हें नौकरी में बनाए रखती हैं, उन्हें टैक्स क्रेडिट या अन्य लाभ दिए जा सकते हैं।

उनके मुताबिक, कर्मचारियों की ट्रेनिंग एक बार की प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए। एआई और तकनीक में लगातार बदलाव के बीच कंपनियों को अपने कर्मचारियों को समय-समय पर नई क्षमताओं के लिए तैयार करना होगा।

एआई सिर्फ नौकरियां खत्म नहीं करेगा

राजन एआई को केवल रोजगार खत्म करने वाली तकनीक के तौर पर नहीं देखते। उनका मानना है कि एआई कंपनियों की उत्पादकता बढ़ाकर लागत और कीमतों को कम कर सकता है। इससे बिक्री और मांग बढ़ सकती है और नई नौकरियों के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।

एआई छोटे कारोबारों के लिए अकाउंटिंग और प्रोग्रामिंग जैसे कामों को आसान और सस्ता बना सकता है। वहीं, कर्मचारी एआई की मदद से पहले की तुलना में अधिक जटिल जिम्मेदारियां भी संभाल सकते हैं।

ऐसे में राजन के सुझाव का मूल सवाल यह है कि एआई कितनी नौकरियां खत्म करेगा, यह नहीं, बल्कि सरकार और कंपनियां कर्मचारियों को बदलती तकनीकी दुनिया के लिए कितनी तेजी से तैयार कर पाती हैं।