लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शनिवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान आज के निर्धारित विषय ‘एकान्तवास से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि दो प्रकार के साधु हो सकते हैं- एक साधु जो जन सम्पर्क से निवृत्त रहते हुए अपनी व्यक्तिगत साधना में समय लगाना चाहते हैं। उन्हें लोगों से मिलने, व्याख्यान देने, लोगों को बताना, प्रेरणा देने से कोई मतलब नहीं होता। वे एकान्त साधना करने वाले होते हैं। वैसे साधक एकान्त पर्वत की गुफाओं, जंगलों आदि में रहते हैं। दूसरे प्रकार के साधु जो समाज में रहते हैं। लोगों को प्रेरणा देते हैं, व्याख्यान सुनाते हैं, लोगों से सम्पर्क करते हैं। तपस्या आदि की प्रेरणा देते हैं। ऐसे कार्यों में भी उनका समय लगता है। बाकी सभी के अपनी व्यक्तिगत रूचि भी होती है। किसी के रुचि लायक काम मिल जाए तो वह उसमें और अच्छा कर सकता है और किसी को उस अनुरूप कार्य न मिले तो उसमें उतना अच्छा नहीं भी हो सकता है।
हमारे धर्मसंघ में कितने-कितने संत अच्छे जन सम्पर्क वाले भी हुए हैं। यहां प्रश्न किया गया कि एकान्तवास से क्या मिलेगा तो बताया गया कि एकान्तवास साधु के लिए उपयोगी है। साधु के रहने का स्थान एकान्त में हो तो ज्यादा ही अच्छा होता है। गृहस्थों के बसे हुए घरों के आसपास नहीं रहना अच्छी बात होती है। इस रूप में साधु को एकान्त रहे। साधना के अनुकूल स्थान होना चाहिए। भगवान महावीर की छवि हो, आचार्यश्री भिक्षु की छवि, गुरुदेव तुलसी की छवि हो तो अच्छी बात हो सकती है। कोई अनावश्यक फोटो आदि न हो तो अच्छी बात हो सकती है। वह स्थान साधना की दृष्टि से अनुकूल हो सकता है। एकान्तवास से चारित्र की रक्षा होती है। जीवन में निमित्त का भी अपना प्रभाव पड़ सकता है।
तेरापंथ की साधुचर्या में निमित्तों से बचने के लिए भी नियमावली बनी है। व्यवस्थागत नियम निमित्त से बचने के होते हैं। एकरूपता से वे नियम सभी के लिए होते हैं। साधु की चारित्र की सुरक्षा एकान्तवास से हो सकती है। साधु-साध्वियों को गुरुकुलवास में रहें या बहिर्विहार में रहें, अपने स्थान आदि के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए। साधु के लिए विगय टालना भी अच्छी बात हो सकती है।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि कल विकास महोत्सव है और उसके साथ दीक्षा समारोह भी है। यह दिन आचार्यश्री तुलसी के पट्टोत्सव का है, जिसे आचार्यश्री महाप्रज्ञजी द्वारा विकास महोत्सव का रूप प्रदान कर दिया गया, तब से यह विकास महोत्सव का आयोजन किया जाता है। कल दीक्षा समारोह भी है। दीक्षा भी विकास का द्योतक है। गुरुदेव तुलसी जैसे हमें ऐसे आचार्य मिले जो आचार्य और गणाधिपति के रूप में 60-61 वर्षों तक रहे। आज तक के तेरापंथ के इतिहास में सर्वाधिक आचार्यकाल प्राप्त करने वाले आचार्य रहे। इतनी छोटी उम्र में आचार्य बनने वाले भी वे एकमात्र आचार्य हुए। उन्होंने कितनी लम्बी-लम्बी यात्राएं कीं। कोलकता से केलवा पधार गए। वे दक्षिण भारत की भी यात्रा की।








