एससी/एसटी आयोग अदालत नहीं, केवल सलाहकार संस्था; सुप्रीम कोर्ट ने तय की शक्तियों की सीमा

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डेस्क : सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति आयोग (SC Commission) की शक्तियों को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि आयोग किसी मामले में बाध्यकारी आदेश पारित नहीं कर सकता। आयोग को केवल शिकायतों की जांच करने, तथ्यों की जानकारी जुटाने और सरकार को अपनी सिफारिशें देने का अधिकार है। वह अदालत या न्यायाधिकरण की तरह किसी विवाद का अंतिम फैसला नहीं कर सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद-338 के तहत गठित राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का उद्देश्य अनुसूचित जातियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना और उनके हितों से जुड़े मामलों में सरकार को सुझाव देना है। आयोग को जांच के लिए कुछ शक्तियां जरूर दी गई हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह न्यायिक संस्था बन जाता है।

आयोग के आदेश नहीं होंगे बाध्यकारी

शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आयोग किसी अधिकारी, विभाग या संस्था को ऐसा निर्देश जारी नहीं कर सकता, जिसे कानूनी रूप से लागू कराना अनिवार्य हो। आयोग की भूमिका सिफारिश करने तक सीमित है। अंतिम निर्णय लेने का अधिकार संबंधित सक्षम प्राधिकारी या अदालत के पास ही रहेगा।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आयोग शिकायत मिलने पर जांच कर सकता है, संबंधित पक्षों से जवाब मांग सकता है और अपनी रिपोर्ट तैयार कर सकता है, लेकिन वह किसी पक्ष के अधिकारों या जिम्मेदारियों का निर्धारण नहीं कर सकता।

आयोग की न्यायिक भूमिका पर उठे थे सवाल

दरअसल, कई मामलों में अनुसूचित जाति आयोग की ओर से अधिकारियों और संस्थानों को निर्देश दिए जाने के बाद यह सवाल उठा था कि क्या आयोग के पास ऐसे आदेश देने का अधिकार है। इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं की शक्तियां संविधान में तय सीमाओं के अनुसार ही इस्तेमाल की जानी चाहिए। किसी संस्था को जांच का अधिकार मिलने का मतलब यह नहीं है कि उसे अदालत जैसी शक्तियां भी मिल गई हैं।

पीड़ितों की शिकायतों पर असर

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से आयोग की भूमिका खत्म नहीं होगी। अनुसूचित जातियों से जुड़े भेदभाव, उत्पीड़न या अधिकारों के उल्लंघन की शिकायतों पर आयोग पहले की तरह जांच कर सकेगा और सरकार या संबंधित विभाग को कार्रवाई के लिए सुझाव दे सकेगा।

हालांकि, अब आयोग के निर्देशों को अदालत के आदेश की तरह लागू नहीं कराया जा सकेगा। किसी भी विवाद में अंतिम कानूनी निर्णय सक्षम न्यायिक संस्था या संबंधित विभाग को ही लेना होगा।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की संवैधानिक स्थिति और उसके अधिकार क्षेत्र को लेकर स्थिति स्पष्ट हो गई है।