फॉकलैंड विवाद में अमेरिका की नई चाल? ट्रंप ने कहा- नीति की समीक्षा जारी

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डेस्क : अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फॉकलैंड द्वीप समूह को लेकर अमेरिकी रुख की समीक्षा किए जाने की बात कही है। ट्रंप के इस बयान से दक्षिण अटलांटिक में स्थित इस विवादित द्वीप समूह को लेकर ब्रिटेन और अर्जेंटीना के बीच दशकों पुराने संप्रभुता विवाद पर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय ध्यान केंद्रित हो गया है।

ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप से पूछा गया कि क्या अमेरिका फॉकलैंड द्वीप की संप्रभुता को लेकर अपनी नीति पर पुनर्विचार कर रहा है। इसके जवाब में ट्रंप ने कहा, “मैं हमेशा हर स्थिति की समीक्षा करता हूं। यह भी उन्हीं में से एक है।”

हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह स्पष्ट नहीं किया कि समीक्षा के बाद अमेरिका अपनी मौजूदा नीति में कोई बदलाव करेगा या नहीं। वर्ष 1982 में हुए फॉकलैंड युद्ध के बाद से अमेरिका ने इस विवाद में आम तौर पर किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करने से परहेज किया है।

अर्जेंटीना का पुराना दावा

फॉकलैंड द्वीप समूह को अर्जेंटीना में ‘इस्लास माल्विनास’ के नाम से जाना जाता है। अर्जेंटीना लंबे समय से इन द्वीपों पर अपनी संप्रभुता का दावा करता रहा है, जबकि ब्रिटेन का कहना है कि द्वीप ब्रिटिश प्रशासन के अधीन हैं और वहां रहने वाले लोगों को अपने राजनीतिक भविष्य का अधिकार है।

दोनों देशों के बीच यह विवाद वर्ष 1982 में युद्ध में बदल गया था। अर्जेंटीना ने अप्रैल 1982 में द्वीपों पर कब्जा कर लिया था, जिसके बाद ब्रिटेन ने सैन्य अभियान चलाकर द्वीपों पर दोबारा नियंत्रण स्थापित किया। करीब 74 दिनों तक चले इस युद्ध में दोनों पक्षों के सैकड़ों सैनिक मारे गए।

युद्ध समाप्त होने के बावजूद संप्रभुता का विवाद आज तक पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

माइलई के लिए अमेरिकी रुख महत्वपूर्ण

ट्रंप का यह बयान अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर माइलई के साथ अमेरिका के बढ़ते राजनीतिक संबंधों के बीच आया है। माइलई लगातार फॉकलैंड द्वीपों पर अर्जेंटीना के दावे को दोहराते रहे हैं और इसे देश का दीर्घकालिक राष्ट्रीय लक्ष्य बताते रहे हैं।

ऐसे में वॉशिंगटन के रुख में किसी भी संभावित बदलाव पर ब्यूनस आयर्स की नजर स्वाभाविक रूप से रहेगी। दूसरी ओर, अमेरिका यदि ब्रिटेन के पारंपरिक रुख से अलग कोई कदम उठाता है, तो इसका असर अमेरिका-ब्रिटेन संबंधों पर भी पड़ सकता है।

ईरान युद्ध और नाटो सहयोगियों का दबाव

फॉकलैंड द्वीप का मुद्दा कथित तौर पर इस वर्ष की शुरुआत में पेंटागन में विचार किए गए कई विकल्पों में शामिल था। इन विकल्पों पर ऐसे नाटो सहयोगियों पर दबाव बनाने के संदर्भ में विचार किया गया था, जिन्हें अमेरिका ने ईरान के साथ युद्ध के दौरान अमेरिकी सैन्य अभियानों के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं देने वाला माना था।

इससे संकेत मिलता है कि ट्रंप प्रशासन अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रीय विवादों और पुराने कूटनीतिक मुद्दों को भी व्यापक रणनीतिक दबाव की नीति के हिस्से के रूप में देख सकता है।

हालांकि, ट्रंप के ताजा बयान को अभी किसी औपचारिक नीति परिवर्तन की घोषणा नहीं माना जा सकता। राष्ट्रपति ने केवल यह कहा है कि अमेरिका अपनी स्थिति की समीक्षा कर रहा है। यह समीक्षा सामान्य विदेश नीति प्रक्रिया का हिस्सा है या वास्तव में अमेरिकी रुख में बड़े बदलाव की तैयारी, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

ब्रिटेन के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत

ब्रिटेन ट्रंप के बयान पर करीबी नजर रखेगा। अमेरिका और ब्रिटेन के बीच रक्षा, खुफिया और रणनीतिक सहयोग लंबे समय से बेहद मजबूत रहा है। ऐसे में फॉकलैंड जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अमेरिकी रुख में किसी भी बदलाव के व्यापक कूटनीतिक प्रभाव हो सकते हैं।

ब्रिटेन फॉकलैंड द्वीपों में सैन्य मौजूदगी बनाए रखता है और अर्जेंटीना के संप्रभुता दावे को लगातार खारिज करता रहा है। वहीं अर्जेंटीना शांतिपूर्ण एवं कूटनीतिक माध्यमों से द्वीपों पर अपना दावा जारी रखने की बात करता है।

फिलहाल ट्रंप ने यह नहीं बताया है कि समीक्षा का परिणाम क्या होगा या अमेरिका अपनी नीति में कोई बदलाव करने जा रहा है। लेकिन उनके बयान ने 1982 के फॉकलैंड युद्ध के बाद अपेक्षाकृत स्थिर रहे अमेरिकी रुख को लेकर नई अटकलों को जरूर जन्म दे दिया है।

अब निगाह इस बात पर है कि ट्रंप प्रशासन की समीक्षा केवल एक नियमित नीति मूल्यांकन तक सीमित रहती है या आने वाले समय में अमेरिका फॉकलैंड विवाद पर अपने दशकों पुराने संतुलित रुख में कोई महत्वपूर्ण बदलाव करता है।