गुरु पूर्णिमा विशेष: मां से मिली सीख, परिवार से जुड़ाव ही जीवन की शक्ति—आदित्य तिक्कू

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नई दिल्ली : भारतीय चिंतन परंपरा में गुरु का स्थान केवल पूजनीय नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाले प्रकाश-पुंज के रूप में रहा है। गुरु वह है, जो अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है; जो केवल मार्ग नहीं दिखाता, बल्कि जीवन-पथ पर आने वाले उतार-चढ़ाव के बीच धैर्य, विवेक और संतुलन के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। गुरु पूर्णिमा इसी महान परंपरा के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा अर्पित करने का पर्व है।

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर हमने लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और विचारक आदित्य तिक्कू से गुरु, जीवन और परिवार के संबंधों को लेकर बातचीत की। गुरु के प्रश्न पर उन्होंने अपनी मां को स्मरण करते हुए कहा कि उनके लिए उनकी मां ही गुरु हैं। उनके व्यक्तित्व में जो स्थिरता, धैर्य और जीवन के प्रति दृष्टि दिखाई देती है, उसके मूल में मां से मिले संस्कार और परिवार से प्राप्त भावनात्मक संबल की महत्वपूर्ण भूमिका है।

आदित्य तिक्कू कहते हैं कि वे आज भी अपनी मां से सीखने का प्रयास कर रहे हैं। उनके लिए जीवन निरंतर परिवर्तन की प्रक्रिया है। प्रत्येक क्षण परिवर्तनशील है और परिवर्तन जीवन का स्वाभाविक नियम है। परिस्थितियां बदलती हैं, समय अपना स्वरूप बदलता है और जीवन मनुष्य को नित नए अनुभवों से परिचित कराता है। किंतु इस परिवर्तनशील संसार में कुछ संबंध ऐसे होते हैं, जिनकी जड़ें समय और परिस्थितियों से परे होती हैं। परिवार उन्हीं संबंधों में सबसे महत्वपूर्ण है।

उनका मानना है कि जीवन में मनुष्य कहीं भी पहुंचे, कितनी भी दूर चला जाए, अपने परिवार से उसका भावनात्मक संबंध बना रहना चाहिए। शिक्षा, रोजगार या जीवन की अन्य आवश्यकताओं के कारण परिवार से भौगोलिक दूरी बन सकती है। कोई व्यक्ति हजारों किलोमीटर दूर रह सकता है, लेकिन यह दूरी मन तक नहीं पहुंचनी चाहिए।

“परिवार से दूरी किलोमीटरों में हो सकती है, मन में नहीं,” यह विचार आदित्य तिक्कू के जीवन-दर्शन का एक महत्वपूर्ण आधार है।

वे कहते हैं कि मनुष्य जितना अपने परिवार से भावनात्मक रूप से जुड़ा रहता है, उतना ही भीतर से प्रसन्न, संतुलित और सुरक्षित अनुभव करता है। परिवार केवल रक्त संबंधों का नाम नहीं, बल्कि वह भावभूमि है, जहां व्यक्ति अपनी सफलताओं के साथ अपनी असफलताओं को भी सहजता से रख सकता है। जीवन की कठिन घड़ियों में यही भावनात्मक आधार मनुष्य को भीतर से टूटने नहीं देता।

आदित्य तिक्कू के अनुसार, जीवन की यात्रा में अनेक पड़ाव आते हैं। कभी परिस्थितियां अनुकूल होती हैं तो कभी प्रतिकूल। सफलता और असफलता, सुख और दुख, मिलना और बिछड़ना—ये सभी जीवन के स्वाभाविक क्रम का हिस्सा हैं। ऐसे समय में परिवार से मिला संस्कार और अपनत्व व्यक्ति को अपने मूल से जोड़े रखता है।

गुरु की भूमिका को लेकर उनका दृष्टिकोण भी इसी जीवन-दर्शन से जुड़ा हुआ है। उनका मानना है कि गुरु का अर्थ केवल किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं किया जा सकता। माता-पिता, शिक्षक, जीवन के अनुभव और यहां तक कि हमारी असफलताएं भी हमें बहुत कुछ सिखाती हैं। जो हमें अपने भीतर झांकने की दृष्टि दे, जो कठिन समय में अपने मूल्यों पर अडिग रहने का साहस दे और जो हमें बेहतर मनुष्य बनने की प्रेरणा दे, वह किसी न किसी रूप में हमारा गुरु है।

उनके लिए मां इस भाव का सबसे सजीव रूप हैं। मां से मिली सीख ने उन्हें जीवन की परिवर्तनशीलता को स्वीकार करना और उसके बीच अपने संबंधों की गरिमा को बनाए रखना सिखाया है। वे मानते हैं कि जीवन में परिस्थितियां चाहे कितनी ही बदल जाएं, अपने परिवार और अपने संस्कारों से जुड़ाव मनुष्य की सबसे बड़ी आंतरिक शक्ति बन सकता है।

आज के समय में गुरु की आवश्यकता पर बात करते हुए आदित्य तिक्कू कहते हैं कि वर्तमान युग में जानकारी के साधन भले ही पहले से कहीं अधिक हो गए हों, लेकिन सही दिशा और विवेक की आवश्यकता आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आज की पीढ़ी के पास दुनिया को जानने के असंख्य माध्यम हैं, लेकिन जानकारी और ज्ञान में अंतर है। जानकारी मन को भर सकती है, परंतु ज्ञान जीवन को दिशा देता है और विवेक यह तय करता है कि उस ज्ञान का उपयोग किस प्रकार किया जाए।

उनके अनुसार, गुरु का वास्तविक महत्व इसी बिंदु पर सामने आता है। सच्चा गुरु केवल सफलता का मार्ग नहीं दिखाता, बल्कि जीवन के मूल्यों से परिचित कराता है। वह व्यक्ति को अपने ऊपर निर्भर नहीं बनाता, बल्कि उसे अपने पैरों पर खड़े होने का आत्मविश्वास देता है।

आदित्य तिक्कू का मानना है कि प्रत्येक प्रभावशाली व्यक्ति गुरु नहीं हो सकता। सच्चा गुरु वही है, जिसकी सीख मनुष्य को भीतर से अधिक संवेदनशील, विनम्र और जिम्मेदार बनाए। गुरु की पहचान इस बात से नहीं होती कि उसके कितने अनुयायी हैं, बल्कि इस बात से होती है कि उसके सान्निध्य से कितने जीवन बेहतर हुए।

गुरु पूर्णिमा के संदर्भ में वे यह भी कहते हैं कि गुरु के प्रति सम्मान किसी एक दिन तक सीमित नहीं होना चाहिए। गुरु की सच्ची वंदना तभी है, जब उनसे मिली सीख हमारे आचरण में दिखाई दे। गुरु के प्रति कृतज्ञता केवल शब्दों में नहीं, बल्कि जीवन के व्यवहार में प्रकट होनी चाहिए।

आज की युवा पीढ़ी के लिए उनका संदेश भी इसी भाव से जुड़ा है। वे कहते हैं कि जीवन में आगे बढ़ना आवश्यक है, सफलता प्राप्त करना भी आवश्यक है, लेकिन इस यात्रा में अपने मूल से कट जाना उचित नहीं। आधुनिक जीवन की आवश्यकताओं के बीच अपनी संस्कृति, संस्कार और परिवार से जुड़े रहना ही मनुष्य को भीतर से दृढ़ बनाता है।

वे युवाओं से अपने माता-पिता का सम्मान करने, अपने अनुभवों से सीखने और ऐसे लोगों का सान्निध्य प्राप्त करने का आग्रह करते हैं, जिनकी संगति उन्हें बेहतर मनुष्य बनने की दिशा दे। उनका मानना है कि जीवन में परिस्थितियां निरंतर बदलती रहेंगी, लेकिन अपने लोगों से जुड़ाव बनाए रखना मनुष्य को भीतर से समृद्ध करता है।

गुरु पूर्णिमा पर आदित्य तिक्कू की बातों में गुरु के प्रति श्रद्धा के साथ परिवार के प्रति गहरा विश्वास भी दिखाई देता है। उनके लिए गुरु कोई दूर खड़ी हुई अवधारणा नहीं, बल्कि जीवन के भीतर उपस्थित वह प्रकाश है, जो बदलती परिस्थितियों में भी सही दिशा का बोध कराता है। और उस प्रकाश का प्रथम स्पर्श उन्हें अपनी मां से मिला।

उनके विचारों का सार यही है कि जीवन में मनुष्य कितना भी आगे बढ़ जाए, उसे अपने मूल से जुड़े रहना चाहिए। दूरी यदि जीवन की आवश्यकता है तो वह भौगोलिक हो सकती है, भावनात्मक नहीं। क्योंकि जब मनुष्य अपने परिवार, अपने संस्कार और अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है, तब जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियां भी उसके भीतर के विश्वास को डिगा नहीं पातीं।

गुरु पूर्णिमा पर उनके शब्दों में यही संदेश गूंजता है—जीवन में प्रकाश देने वाले हाथों को कभी मत भूलिए। और यदि वह प्रकाश मां के रूप में मिला हो, तो उससे बड़ा गुरु और उससे बड़ा आशीर्वाद जीवन में शायद ही कुछ हो।