डेस्क : इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने पारिवारिक पेंशन को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि मृत सरकारी कर्मचारी की अविवाहित बहन को पारिवारिक पेंशन देने से इनकार नहीं किया जा सकता, जब संबंधित वैधानिक नियम उसे इसके दायरे में शामिल करते हैं। अदालत ने पेंशन का दावा खारिज करने वाले आदेश को निरस्त करते हुए छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ बकाया राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति मनीष कुमार की एकल पीठ ने यह आदेश शमीम खान की याचिका पर दिया। याचिकाकर्ता के अनुसार, उनके दिवंगत भाई ने अपनी सेवा पुस्तिका में उन्हें पारिवारिक पेंशन के लिए नामित किया था। इसके बावजूद पांच दिसंबर 2025 को उनका दावा खारिज कर दिया गया था।
सरकारी आदेश के आधार पर खारिज किया गया था दावा
पेंशन देने से इनकार करने के लिए 23 दिसंबर 2016 के शासनादेश का हवाला दिया गया था। इस आदेश में अविवाहित बहन को मृत कर्मचारी के परिवार की परिभाषा से बाहर रखा गया था।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सेवानिवृत्ति लाभ नियमावली, 1961 के नियम 3(5) का उल्लेख किया। अदालत के अनुसार, इस नियम में अविवाहित और विधवा बहनों को परिवार की परिभाषा में शामिल किया गया है। राज्य सरकार ने भी याचिकाकर्ता के मृत कर्मचारी की अविवाहित बहन होने के तथ्य का खंडन नहीं किया।
वैधानिक सेवा नियमों को शासनादेश से नहीं बदला जा सकता
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत बनाए गए वैधानिक सेवा नियमों को किसी कार्यकारी आदेश या शासनादेश के जरिए बदला अथवा निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता। ऐसे नियमों में संशोधन के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।
अदालत ने इसी आधार पर पारिवारिक पेंशन देने से इनकार करने वाले आदेश को निरस्त कर दिया।
छह प्रतिशत ब्याज के साथ बकाया भुगतान का निर्देश
हाईकोर्ट ने खाद्य एवं रसद विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश दिया कि शमीम खान को उनके भाई की मृत्यु की तारीख 15 मई 2024 से लेकर वास्तविक भुगतान होने तक की पारिवारिक पेंशन का बकाया छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित दिया जाए।
अदालत ने भुगतान की प्रक्रिया आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने या प्राप्त होने के छह सप्ताह के भीतर पूरी करने का निर्देश भी दिया।









