मन व वाणी का ही नहीं, शरीर का भी रखें संयम: शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में योगक्षेम वर्ष का महामंगल प्रवास कर रहे तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘कायगुप्तता से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से विवेचित करते हुए कहा कि शास्त्र में प्रश्नोत्तर का क्रम चला है। प्रश्न किया गया कि भंते! कायगुप्तता से जीव क्या प्राप्त करता है?
मनुष्य जीवन को देखा जाए तो आत्मा शाश्वत है, जो सदा थी, है और रहेगी। वहीं शरीर विनाशधर्मा है तथा आत्मा अविनाशी है। शरीर एक पर्याय है, जिसमें परिवर्तन हो सकता है। आत्मा अमर है, अचल है। आत्मा जीवन का एक मौलिक तत्त्व है। इसका अनंतकाल से जन्म-मरण का क्रम चल रहा है। सृष्टि का प्रत्येक जीव अनंत बार जन्म-मृत्यु के क्रम को पूरा कर चुका है। मनुष्य के जीवन में शरीर, वाणी और मन भी प्राप्त है।
शास्त्र में मन, वचन और शरीर का संयम रखने की प्रेरणा दी गई है। संयम रखेंगे तो चेतना भी अच्छी रह सकेगी, जीवन में शांति और सुख भी रह सकता है। इसलिए आदमी को अपने जीवन में मन, वचन और शरीर का संयम रखने का प्रयास करना चाहिए। मन में गलत विचार न करे, किसी का अनिष्ट न सोचे, वाणी का कटु और झूठ बोलने के रूप में न करे और शरीर का संयम भी रखने का प्रयास करना चाहिए। किसी को मारना, थप्पड़ मारना या किसी का प्राण हरण कर लेना- ऐसे कार्यों से शरीर को बचाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
परम पूजनीय अणुव्रत अनुशास्ता आचार्यश्री तुलसी ने अणुव्रत आन्दोलन चलाया, उसमें उन्होंने संयममय जीवन बनाने और अपने पर अपना अनुशासन करने की प्रेरणा प्रदान की। अणुव्रत का मौलिक तत्त्व संयम है। अपने शरीर का संयम काय गुप्तता होती है। शरीर का संयम अर्थात् कायगुप्तता से जीव संवर को प्राप्त कर सकता है। संवर से जो कायगुप्त होता है, वह पाप कर्मों का निरोध कर देता है। कायगुप्तता से पाप कर्मों का निरोध हो सकता है। कायगुप्तता होने से पाप कर्मों का आगमन बंद हो जाता है। साधु-साध्वियों की साधना का एक अंग है कायगुप्ति। शरीर का संयम जो गृहस्थों के लिए भी आवश्यक है। गृहस्थ भी इतना संयम रखे कि फालतू किसी को दुःख न दे। मन का संयम, मन चंचल न रहे और मन में पवित्रता रहे।
मंगल प्रवचन के दौरान ही आचार्यश्री ने अणुव्रत, प्रेक्षाध्यान आदि गतिविधियों का वर्णन करते हुए उपस्थित लोगों को थोड़े समय तक महाप्राण ध्वनि का प्रयोग भी कराया। आचार्यश्री ने अणुव्रत के संदर्भ में उपस्थित भारत के केन्द्रीय कानून एवं न्याय राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री अर्जुनराम मेघवाल के संदर्भ में कहा कि मंत्रीजी यदा-कदा आते रहते हैं। इनका अणुव्रत से भी जुड़ाव है और जैन विश्व भारती इंस्टिट्युट के कुलाधिपति के रूप में भी जुड़े हुए हैं। आचार्यश्री तुलसी के समय से जुड़े हुए हैं। मंत्रीजी ने आचार्यश्री को वंदन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किए। आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर भी प्रदान किए।
तदुपरान्त श्री मेघवाल ने अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहा कि मैं तो केवल आचार्यश्री को सुनने के लिए आया था। आज मुझे पुनः महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी व युवाचार्यश्री के दर्शन का अवसर मिला है। विकसित भारत के अनेक पैरामिटर हो सकते हैं, उनमें एक पैरामिटर आध्यात्मिक पॉवर का भी है और यह पॉवर आचार्यश्री जैसे महापुरुषों से ही प्राप्त हो सकती है। भारत की आध्यात्मिक ज्ञान संपदा सबसे बड़ी पूंजी है। भारत इस पूंजी के आधार पर संसार का नेतृत्व कर सकता है। आपके यहां आने से बहुत एनर्जी प्राप्त होती है। मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे आचार्यश्री तुलसी के श्रीमुख से ही अणुव्रत का ज्ञान मिला और उससे मैं यहां तक पहुंच पाया।
जैन विश्व भारती द्वारा समणी सत्यप्रज्ञाजी द्वारा लिखित पुस्तक ‘अहिंसा विमर्श’ तथा जैन विश्व भारती का विकास वृत्तांत ‘उत्कर्ष’ आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित किया गया। इस संदर्भ में आचार्यश्री ने मंगल प्रेरणा प्रदान की। समणी सत्यप्रज्ञाजी ने इस संदर्भ में अपनी अभिव्यक्ति दी।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अणुव्रत विश्व भारती सोसायटी द्वारा आयोजित क्रिएटिविटी कॉन्टेस्ट 2026 के राष्ट्रीय प्रतियोगिता एवं सम्मान समारोह का मंचीय उपक्रम रहा। इस संदर्भ में अणुव्रत विश्व भारती सोसयाटी के अध्यक्ष श्री प्रतापसिंह दूगड़ ने अपनी अभिव्यक्ति दी। अणुव्रत क्रिएटिविटी कॉन्टेस्ट की टीम ने युवाचार्यश्री द्वारा लिखित गीत का संगान किया।
इस संदर्भ में युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी ने भी अपना उद्बोधन प्रदान किया। अणुव्रत अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सभी को पावन पाथेय प्रदान किया।