डेस्क : आम लोगों को आने वाले महीनों में महंगाई का एक और झटका लग सकता है। रोजाना इस्तेमाल होने वाले सामान बनाने वाली प्रमुख कंपनियां जुलाई से सितंबर 2026 की तिमाही में कई उत्पादों की कीमतों में फिर बढ़ोतरी करने की तैयारी में हैं। चीनी, पाम ऑयल और दूसरे कच्चे माल की बढ़ती कीमतों ने कंपनियों की लागत बढ़ा दी है। इसके अलावा कच्चे तेल की कीमत, मौसम और पश्चिम एशिया में जारी तनाव भी कंपनियों की चिंता बढ़ा रहा है।
कंपनियां लागत बढ़ने का असर ग्राहकों पर डालने के लिए केवल कीमत बढ़ाने का रास्ता नहीं अपना रही हैं। कई उत्पादों के पैकेट में सामान की मात्रा घटाने की रणनीति भी अपनाई जा रही है। इसे ‘श्रिंकफ्लेशन’ कहा जाता है। इसमें पैकेट की कीमत पहले जैसी ही रहती है, लेकिन उसके अंदर उत्पाद का वजन या मात्रा कम हो जाती है। यानी ग्राहक को कीमत बढ़ी हुई दिखाई नहीं देती, लेकिन उसी कीमत में पहले की तुलना में कम सामान मिलता है।
जून तिमाही में भी बढ़ी थीं कीमतें
रोजमर्रा के सामान बनाने वाली कंपनियों ने अप्रैल से जून 2026 की तिमाही में औसतन 2 से 5 प्रतिशत तक कीमतें बढ़ाई थीं। अब जुलाई से सितंबर की तिमाही में कुछ उत्पादों पर एक बार फिर कीमत बढ़ाने की तैयारी है।
कंपनियां चीनी, पाम ऑयल और दूसरे कच्चे माल की कीमतों के अलावा कच्चे तेल की कीमतों पर भी नजर रख रही हैं। मानसून और अल नीनो की संभावित स्थिति भी कारोबार के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव से भी लागत और आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका है।
हालांकि कंपनियों को भारतीय बाजार में मांग मजबूत बने रहने की उम्मीद है। प्रीमियम उत्पादों की बढ़ती मांग, ब्रांडेड सामान की ओर ग्राहकों का रुझान और कारोबार में सुधार से कंपनियों को भरोसा है कि नियंत्रित कीमत बढ़ोतरी के बावजूद बिक्री पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ेगा।
ब्रिटानिया के बिस्किट में घट सकती है मात्रा
बिस्किट बनाने वाली प्रमुख कंपनी ब्रिटानिया सितंबर तिमाही में करीब 1.5 से 2 प्रतिशत तक अतिरिक्त कीमत संबंधी कदम उठा सकती है। कंपनी खास तौर पर 5 और 10 रुपये वाले छोटे पैकेटों में मात्रा घटाने का रास्ता अपना सकती है।
इसका मतलब है कि 5 या 10 रुपये का पैकेट उसी कीमत में बाजार में मिलता रहेगा, लेकिन उसमें बिस्किट की संख्या या कुल वजन पहले के मुकाबले कम हो सकता है।
कंपनी के मुताबिक चीनी और पाम ऑयल जैसी प्रमुख वस्तुओं की लागत अभी भी ऊंची बनी हुई है। इसके बावजूद कंपनी का कहना है कि बाजार में मांग मजबूत है। कंपनी वित्त वर्ष 2027 में लाभ के मार्जिन को कम से कम वित्त वर्ष 2026 के स्तर पर बनाए रखने की कोशिश करेगी।
गोदरेज कंज्यूमर भी बढ़ा सकती है कीमत
गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स ने अप्रैल-जून तिमाही में औसतन करीब 5 प्रतिशत कीमत बढ़ाई थी। कंपनी आगे भी कीमत बढ़ाने पर विचार कर सकती है, लेकिन फिलहाल वह कच्चे माल की कीमतों को लेकर स्थिति और स्पष्ट होने का इंतजार कर रही है।
कंपनी के कई कच्चे माल की कीमतें कच्चे तेल से जुड़ी हैं। कच्चे तेल की कीमत में बदलाव का असर कंपनी की लागत पर आमतौर पर तीन से चार सप्ताह बाद दिखाई देता है। फिलहाल कच्चे तेल की कीमतों को देखते हुए कंपनी को तत्काल बड़ी कीमत बढ़ोतरी की जरूरत महसूस नहीं हो रही है। हालांकि, लागत में फिर तेजी आती है तो कीमतों में बदलाव किया जा सकता है।
डाबर पर भी लागत का दबाव
डाबर इंडिया ने भी संकेत दिया है कि कच्चे माल की ऊंची कीमतों का दबाव निकट भविष्य में बना रह सकता है। कंपनी जरूरत के अनुसार कीमतों में बदलाव के साथ लागत कम करने और उत्पादकता बढ़ाने पर भी जोर दे रही है।
डाबर को वित्त वर्ष 2027 में दोहरे अंक में राजस्व वृद्धि की उम्मीद है। हालांकि, कंपनी ने यह भी माना है कि महंगाई के कारण उत्पादों की बिक्री की मात्रा पर दबाव आ सकता है। मौजूदा स्थिति में कीमत और कुल बिक्री में वृद्धि की तुलना में मात्रा की वृद्धि धीमी रहने की आशंका है।
एचयूएल भी कई उत्पादों की कीमत बढ़ा सकती है
देश की बड़ी रोजमर्रा के इस्तेमाल वाले सामान की कंपनियों में शामिल हिंदुस्तान यूनिलीवर भी सितंबर तिमाही में कई श्रेणियों के उत्पादों की कीमतें बढ़ा सकती है।
कंपनी ने अप्रैल-जून तिमाही में करीब 2 से 5 प्रतिशत तक कीमतें बढ़ाई थीं। अब जुलाई-सितंबर तिमाही में पिछली तिमाही की तुलना में करीब 2 से 5 प्रतिशत की क्रमिक महंगाई का अनुमान लगाया गया है।
कंपनी का रुख धीरे-धीरे और जरूरत के हिसाब से कीमतों में बदलाव करने का है। इसका उद्देश्य बढ़ती लागत का असर कम करना है, लेकिन कंपनी बिक्री की मात्रा में वृद्धि को भी बनाए रखना चाहती है।
टाटा कंज्यूमर और नेस्ले भी रख रही हैं नजर
टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स ने कहा है कि अगर लागत का दबाव आगे भी बना रहता है तो कंपनी कीमतों में बदलाव कर सकती है। कंपनी के अनुसार इस समय लागत से जुड़ी परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं और पश्चिम एशिया की स्थिति भी अनिश्चित बनी हुई है। इसलिए कंपनी वास्तविक लागत बढ़ने की स्थिति में ही कीमतों में बदलाव करना चाहती है।
नेस्ले इंडिया भी महंगाई और भू-राजनीतिक तनाव को लेकर सतर्क है। कंपनी ने निकट अवधि में कुल खपत में कुछ कमजोरी आने की आशंका जताई है। पश्चिम एशिया का संघर्ष, मानसून और अल नीनो का संभावित प्रभाव खाद्य एवं पेय पदार्थ कारोबार के लिए प्रमुख जोखिम माने जा रहे हैं।
साबुन से लेकर खाद्य पदार्थ तक पर असर
आने वाले महीनों में बिस्किट, साबुन, शैंपू, व्यक्तिगत देखभाल के सामान, खाद्य तेल, चाय-कॉफी और पैकेज्ड खाद्य पदार्थ जैसी रोजमर्रा की चीजों पर ग्राहकों का खर्च बढ़ सकता है।
हालांकि कंपनियां एक साथ बड़ी कीमत बढ़ाने के बजाय चुनिंदा उत्पादों पर धीरे-धीरे कीमत बढ़ाने की रणनीति अपना रही हैं। कुछ उत्पादों में कीमत वही रखते हुए पैकेट का वजन या मात्रा कम की जा सकती है।
इसका मतलब यह है कि बाजार में हर सामान की कीमत एक साथ बढ़े, ऐसा जरूरी नहीं है। आने वाले महीनों में कच्चे माल की कीमत, कच्चा तेल, मानसून और वैश्विक परिस्थितियां तय करेंगी कि कंपनियों को कितनी कीमत बढ़ानी पड़ती है।








