एफसीआरए बिल: विनय क्वात्रा ने एनजीओ की संपत्ति जब्ती और धार्मिक निशाने के दावों को खारिज किया

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नई दिल्ली : प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA Bill 2026) को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच अमेरिका में भारत के राजदूत विनय क्वात्रा ने विधेयक से जुड़े कई दावों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि कानून का उद्देश्य विदेशी अंशदान के नियमन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है, न कि किसी धर्म या समुदाय विशेष की संस्थाओं को निशाना बनाना।

FCRA संशोधन विधेयक 2026 को मानसून सत्र में लोकसभा में दोबारा पेश किया गया है। प्रस्तावित कानून के तहत विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों की निगरानी और नियमन से जुड़े प्रावधानों में बदलाव किया जाना है।

2010 से लागू है संपत्ति से जुड़ा प्रावधान

NGO की संपत्ति, अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान या पूजा स्थलों पर सरकार के कब्जे की आशंकाओं पर क्वात्रा ने कहा कि पंजीकरण रद्द होने या संस्था द्वारा पंजीकरण सरेंडर करने की स्थिति में विदेशी अंशदान और उससे बनाई गई संपत्तियों के संबंध में प्रावधान 2010 से ही लागू हैं।

उन्होंने कहा कि 2026 का प्रस्तावित संशोधन एक नामित प्राधिकरण के माध्यम से ऐसी संपत्तियों की सुरक्षा और प्रबंधन की व्यवस्था करता है। यदि संबंधित संगठन दोबारा अपना पंजीकरण बहाल करा लेता है तो उसकी संपत्ति और अप्रयुक्त धनराशि उसे वापस कर दी जाएगी।

पूजा स्थलों के लिए भी विशेष सुरक्षा

क्वात्रा ने कहा कि पूजा स्थलों से जुड़ी संपत्तियों के लिए कानून में विशेष सुरक्षा का प्रावधान है। यदि किसी पंजीकरण रद्द किए गए संगठन ने पूजा स्थल से संबंधित संपत्ति बनाई है तो उसे उसी धर्म से जुड़े किसी अन्य FCRA-पंजीकृत संगठन को सौंपे जाने की व्यवस्था है, ताकि पूजा और धार्मिक गतिविधियों की निरंतरता बनी रहे।

सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होगा कानून

FCRA कानून के धार्मिक आधार पर इस्तेमाल किए जाने के आरोपों को खारिज करते हुए क्वात्रा ने कहा कि कानून सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होता है। उनके मुताबिक किसी धर्म, समुदाय या विचारधारा के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता।

उन्होंने कहा कि धार्मिक शिक्षा, पूजा स्थलों के रखरखाव और परोपकारी गतिविधियों सहित विभिन्न धर्मों से जुड़े कल्याणकारी कार्य विदेशी अंशदान प्राप्त करने के लिए पात्र बने रहेंगे।

विदेशी अंशदान में बढ़ोतरी का दावा

NGO के कामकाज पर FCRA के प्रतिकूल प्रभाव और विदेशी धन के प्रवाह में कमी के दावों पर क्वात्रा ने आंकड़ों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि भारत में विदेशी अंशदान का प्रवाह घटने के बजाय बढ़ा है। उनके अनुसार, पंजीकृत संगठनों को मिलने वाला विदेशी अंशदान 2010-11 में करीब 1.2 अरब डॉलर से बढ़कर 2024-25 में 2.67 अरब डॉलर हो गया।

क्वात्रा ने यह भी कहा कि भारत में तीन करोड़ से अधिक नहीं, बल्कि 30 लाख से अधिक NGO हैं, जबकि इनमें से केवल 14,450 संगठन FCRA के तहत पंजीकृत हैं। उन्होंने कहा कि अधिकांश नागरिक समाज संगठन FCRA के दायरे से बाहर हैं।

विदेशी चंदे के लिए तीन प्रमुख शर्तें

क्वात्रा ने कहा कि FCRA विदेशी चंदे, शोध अनुदान या मानवीय सहायता को रोकता नहीं है। इसके तहत संगठनों से मुख्य रूप से पंजीकरण कराने, निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से धन प्राप्त करने और उसके उपयोग की रिपोर्ट देने की अपेक्षा की जाती है।

उन्होंने विदेशी वित्तीय प्रवाह के नियमन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सामान्य व्यवस्था बताया। क्वात्रा के मुताबिक अमेरिका में FARA 1938 और FATCA 2010 से लागू हैं। ऑस्ट्रेलिया ने 2018 में, कनाडा ने 2024 में और ब्रिटेन ने जुलाई 2025 में संबंधित व्यवस्थाएं लागू कीं, जबकि यूरोपीय संघ भी इस दिशा में कानून बना रहा है।

12 अगस्त को संसद में चर्चा की संभावना

प्रस्तावित FCRA संशोधन विधेयक में पंजीकरण की अवधि समाप्त होने, नवीनीकरण नहीं होने या सरकार द्वारा नवीनीकरण से इनकार किए जाने की स्थिति में संगठन का FCRA पंजीकरण समाप्त होने का प्रावधान है। साथ ही विदेशी अंशदान और उससे जुड़ी संपत्तियों के हस्तांतरण, निगरानी, प्रबंधन और निपटान के लिए नामित प्राधिकरण बनाए जाने का प्रस्ताव है।

केंद्र सरकार 12 अगस्त को संसद में FCRA संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा करा सकती है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित बदलाव विदेशी अंशदान के नियमन में पारदर्शिता, जवाबदेही और बेहतर प्रशासन सुनिश्चित करने की दिशा में अगला कदम हैं।