जयपुर : कर्तव्य केवल किसी जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र, विवेक और जीवन-मूल्यों का प्रतिबिंब है। जो व्यक्ति अपने कर्तव्यों को समझकर उनका निष्ठापूर्वक पालन करता है, वही जीवन में सफलता के साथ सार्थकता भी प्राप्त करता है। यह विचार मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने मालवीय नगर स्थित अणुविभा केंद्र में आयोजित ‘कर्तव्य की महत्ता’ विषयक कार्यशाला में व्यक्त किए।
मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ एवं मुनिश्री संभव कुमार जी के सान्निध्य में आयोजित कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर स्तुति के साथ हुआ। इस अवसर पर श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, जयपुर एवं राज-राजेश्वरी नगर, बेंगलुरु इकाई की ओर से जैन विश्व भारती, लाडनूं के नवनिर्वाचित अध्यक्ष एवं मेवाड़ गौरव श्री गौरव मांडोत का साहित्य भेंट कर आत्मीय सम्मान किया गया।
कार्यक्रम में बेंगलुरु उपक्षेत्र के अध्यक्ष श्री मदन लाल बोराणा एवं मंत्री श्री प्रकाश मांडोत ने जानकारी दी कि बेंगलुरु से लगभग ८० व्यक्तियों का प्रतिनिधिमंडल जयपुर पहुंचा है। इसमें मेवाड़ एवं मारवाड़ के श्रावक-श्राविकाएं सम्मिलित हैं। यह प्रतिनिधिमंडल आगे लाडनूं जाकर जैन विश्व भारती में विराजित आचार्य श्री महाश्रमण जी के सेवा-दर्शन का लाभ प्राप्त करेगा। श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, जयपुर के वरिष्ठ उपाध्यक्ष श्री राजेंद्र बांठिया ने भी साहित्य भेंट कर आगंतुक साधर्मिक बंधुओं का स्वागत एवं सम्मान किया।
कर्तव्यबोध से ही जीवन को मिलती है सार्थकता
सम्मान समारोह के पश्चात आयोजित कार्यशाला में मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कर्तव्यनिष्ठा को सफलता का आधार बताते हुए कहा कि यह मानव का विशिष्ट गुण है। कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति जीवन में सफलता और शुभ परिणाम प्राप्त करता है। कर्तव्य तथा अकर्तव्य के बीच अंतर समझने का विवेक ही मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग पहचान देता है। उन्होंने कहा कि कर्तव्य का सम्यक बोध और उसका सम्यक पालन करने वाला व्यक्ति ही वास्तव में महान होता है।
मुनिश्री ने अपने विचारों के माध्यम से यह संदेश दिया कि जीवन में अधिकारों के साथ कर्तव्यों की समझ भी आवश्यक है। जब व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग रहता है, तब उसका आचरण स्वयं के साथ-साथ समाज के लिए भी कल्याणकारी बनता है।
सामाजिक और धार्मिक जीवन में कर्तव्य का विशेष महत्त्व
मुनिश्री संभव कुमार जी ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में कर्तव्य-विमुखता के बीच कर्तव्यबोध की प्रेरणा अत्यंत आवश्यक हो गई है। सामाजिक कर्तव्यों का पालन समाज की व्यवस्था और समरसता के लिए महत्त्वपूर्ण है, वहीं धार्मिक कर्तव्यों का निर्वहन व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है।
उन्होंने कहा कि कर्तव्य से विमुख व्यक्ति केवल अपना ही नहीं, बल्कि दूसरों का भी अहित कर सकता है। इसके विपरीत, कर्तव्यनिष्ठा व्यक्ति और समाज, दोनों के लिए हितकारी होती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने दायित्वों के प्रति सजग रहकर उनका ईमानदारी से निर्वहन करना चाहिए।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं की उपस्थिति रही। आध्यात्मिक सान्निध्य, सम्मान समारोह और विचारपूर्ण कार्यशाला के माध्यम से उपस्थित जनसमुदाय को कर्तव्यनिष्ठ जीवन अपनाने की प्रेरणा मिली।









