नई दिल्ली : मदरसों और संस्कृत स्कूलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अहम मांग उठी है। याचिका में मांग की गई है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) का दायरा मदरसों और संस्कृत स्कूलों तक बढ़ाया जाए तथा इन संस्थानों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को अनिवार्य किया जाए। सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर सुनवाई करेगा।
याचिका में कहा गया है कि राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) की ओर से निर्धारित TET की अनिवार्यता अधिनियम की धारा 2(n) के तहत आने वाले सभी स्कूलों के शिक्षकों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। याचिकाकर्ता ने मौजूदा छूट पर सवाल उठाते हुए कहा है कि बच्चों को मिलने वाली शिक्षा के अधिकार में संस्थान के प्रकार के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए।
याचिका में तर्क दिया गया है कि RTE कानून का मुख्य उद्देश्य बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराना है। ऐसे में केवल इस आधार पर अलग व्यवस्था नहीं होनी चाहिए कि बच्चा किस तरह के संस्थान में पढ़ रहा है।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा है कि कानून में ‘मुख्य रूप से धार्मिक शिक्षा प्रदान करने’ की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है। इसके लिए न तो कोई निश्चित मानदंड है और न ही किसी अधिकृत प्राधिकरण की व्यवस्था है। ऐसे में मदरसों को RTE के दायरे से बाहर रखने के आधार पर भी सवाल उठाए गए हैं।
TET को अनिवार्य करने के संबंध में याचिका में कहा गया है कि इससे अल्पसंख्यक संस्थानों के अपने संस्थान स्थापित करने और संचालित करने के अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। संस्थान योग्य उम्मीदवारों में से अपनी पसंद के शिक्षकों का चयन करने के लिए स्वतंत्र रहेंगे।
मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद यह स्पष्ट होगा कि मदरसों और संस्कृत स्कूलों में RTE और TET से जुड़े नियमों को लेकर अदालत का रुख क्या रहता है। यह मामला शिक्षा के अधिकार, शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता और अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों से संबंधित है।








