मोक्ष के बिना निर्वाण की प्राप्ति संभव नहीं : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जैन विश्व भारती परिसर में योगक्षेम वर्ष का मंगल प्रवास करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में मानों धार्मिक-आध्यात्मिक गतिविधियों का मेला-सा लगा हुआ है। देश-विदेश से लोग पूज्य सन्निधि में उपस्थित होकर अपने जीवन को आध्यात्मिकता से भावित बना रहे हैं। कहीं आगमों के अध्ययन, वाचन आदि का कार्य चल रहा है तो कहीं प्रेक्षाध्यान, साधना आदि का कार्य चल रहा है। कितने-कितने चारित्रात्माएं तो कितने-कितने गृहस्थ भी तपस्या करने में जुटे हुए हैं। इस प्रकार मानों युगप्रधान अनुशास्ता की मंगल सन्निधि में ज्ञान, दर्शन और चारित्र की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है और श्रद्धालु इस त्रिवेणी में डुबकी लगाकर स्वयं के जीवन को धन्य बना रहे हैं।
नित्य की भांति मंगलवार को प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के लिए सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘बिना मोक्ष के निर्वाण कहां?’ को उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से विवेचित करते हुए कहा कि एक प्रश्न हो सकता है कि निर्वाण किसको प्राप्त हो सकता है? इसका आगम में उत्तर दिया गया कि जिसका मोक्ष हो जाता है, सकल कर्म मुक्ति हो जाती है, उसीको निर्वाण प्राप्त हो सकता है। दूसरा प्रश्न भी हो सकता है कि मोक्ष किसको प्राप्त हो सकता है? इसका भी समाधान दिया गया कि जिसमें चारित्र गुण हैं, उसका मोक्ष हो सकता है। पुनः प्रश्न हो सकता है कि चरण गुण किसमें होता है? उत्तर प्रदान करते हुए बताया गया कि जिसमें सम्यक् ज्ञान होता है, उसमें चरण गुण हो सकते हैं। पुनः प्रश्न किया गया कि सम्यक् ज्ञान किसमें हो सकता है? समाधान प्रदान किया गया कि जो सम्यक् दर्शन वाला होता है, उसमें सम्यक् ज्ञान हो सकता है।
अदर्शनी के पास ज्ञान नहीं होता। जो सम्यक् दर्शन वाला नहीं, उसमें सम्यक् ज्ञान भी नहीं हो सकता। जिसमें सम्यक् ज्ञान नहीं होता, उसमें चरण गुण नहीं हो सकते। जिसमंे गुण नहीं हैं, उसका मोक्ष भी नहीं हो सकता और जिसका मोक्ष नहीं होता, उसे निर्वाण नहीं प्राप्त हो सकता। दर्शन शब्द के अनेक अर्थ हो सकते हैं। दर्शन का एक अर्थ देखना होता है। दर्शन का दूसरा अर्थ नेत्र भी होता है, जिसके माध्यम से देखा जाता है। सामान्य अवबोध का नाम भी दर्शन है। दर्शन शब्द का चौथा अर्थ है दिखाना। दर्शन शब्द का अर्थ सिद्धांत भी होता है। दर्शन शब्द का छठा अर्थ करें तो श्रद्धा, आस्था रुचि के संदर्भ में लिया जा सकता है। इस प्रकार दर्शन शब्द के छह अर्थ हो जाते हैं।
यहां दर्शन शब्द श्रद्धा, आस्था के संदर्भ में उपयोग किया है। इसलिए शास्त्रकार ने कहा कि जिसके सम्यक् दर्शन नहीं है, उसे सम्यक् ज्ञान नहीं हो सकता। सम्यक् दर्शन कारण और सम्यक् ज्ञान कार्य है। सम्यक् ज्ञान के बिना चरण गुण नहीं आ सकते। जिसमें चारित्र गुण नहीं होता, उसके मोक्ष नहीं होता। अमोक्ष का निर्वाण नहीं होता। इसलिए मिथ्यात्वी को सम्यक् ज्ञानी बनने का प्रयास करना चाहिए, जिससे वह मोक्ष की ओर भी गति कर सके।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए। उपासक शिविर के संभागियों को आचार्यश्री ने उपसंपदा प्रदान की। तदुपरान्त प्रेक्षाध्यान के शिविरार्थियों को आचार्यश्री ने उपसंपदा प्रदान की।