मर्यादा ही धर्म, समाज और राष्ट्र की मजबूती का आधार : मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’

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जयपुर :जीवन में मर्यादा केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि आत्मानुशासन, पारस्परिक सम्मान और सामाजिक समरसता का आधार है। जहां मर्यादाओं का सम्मान होता है, वहां परिवार में प्रेम, समाज में शांति और राष्ट्र में एकता एवं समृद्धि का वातावरण निर्मित होता है। यह विचार मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने शुक्रवार को जयपुर के मालवीय नगर स्थित अणुविभा केन्द्र में आयोजित तेरापंथ धर्मसंघ की मर्यादाओं के वाचन कार्यक्रम में व्यक्त किए।

मुनिश्री ने कहा कि मर्यादा जीवन को सही दिशा देने वाली शक्ति है। मर्यादावान व्यक्ति समाज में सम्मान प्राप्त करता है, जबकि मर्यादाओं का उल्लंघन व्यक्ति को पतन की ओर ले जाता है। प्रकृति भी अपनी निर्धारित मर्यादाओं में रहकर ही जीवन का संरक्षण करती है। इसलिए मनुष्य के लिए भी आवश्यक है कि वह अपने आचरण, व्यवहार और विचारों में मर्यादा को स्थान दे।

भगवान राम और आचार्य भिक्षु के जीवन से मिली मर्यादा की प्रेरणा

मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ने भगवान श्रीराम के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि मर्यादा ने ही उन्हें आदर्श पुरुष के रूप में प्रतिष्ठित किया। उन्होंने तेरापंथ धर्मसंघ के संस्थापक आचार्य भिक्षु के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि आचार्य भिक्षु केवल मर्यादाओं के निर्माता नहीं थे, बल्कि उन्होंने संघ के प्रत्येक सदस्य में उनके प्रति निष्ठा और समर्पण की भावना भी जागृत की। मर्यादाएं निर्धारित करना महत्वपूर्ण है, लेकिन उनसे जुड़ी आस्था, अनुशासन और पालन की भावना विकसित करना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि भगवान महावीर द्वारा साधु जीवन के लिए निर्धारित मर्यादाओं के अनुरूप आचार्य भिक्षु ने संघ की एकता, अखंडता, सुव्यवस्था, समता, समाधिस्थता तथा पारस्परिक प्रेम और समरसता को सुदृढ़ बनाने वाली मर्यादाओं को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। यही कारण है कि ढाई सौ वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी तेरापंथ धर्मसंघ अपनी संगठनात्मक एकता और अखंडता के लिए जाना जाता है।

संयम और अनुशासन ही साधु जीवन की पहचान

कार्यक्रम में मुनिश्री संभव कुमार जी ने जैन साधु जीवन में अनुशासन के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने पांच महाव्रत, पांच समितियों और तीन गुप्तियों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये साधु जीवन के महत्वपूर्ण अनुशासन हैं। इनका सजगता और निष्ठा के साथ पालन करने वाला संत वंदनीय एवं पूजनीय होता है। संयम, जागरूकता और आत्मानुशासन साधना को सार्थक बनाते हैं।

मुनिश्री ने कहा कि मर्यादा का महत्व केवल धार्मिक जीवन तक सीमित नहीं है। परिवार में मर्यादा रिश्तों को मजबूत करती है, समाज में विश्वास और सद्भाव बढ़ाती है तथा राष्ट्र में शांति, एकता और विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों और सीमाओं के प्रति सजग रहे, तो अनेक सामाजिक समस्याओं का समाधान संभव है।

स्तुति, प्रेक्षाध्यान और जप अनुष्ठान के साथ हुआ कार्यक्रम

इस अवसर पर तेरापंथ महिला मंडल की शहर अध्यक्षा श्रीमती कौशल्या जैन ने रविवारीय कार्यशाला की जानकारी दी। सुश्रावक रमेश कुमार जैन ने श्रावक निष्ठा पत्र का वाचन किया। कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर अरिष्ट नेमि प्रभु की स्तुति से हुआ। इसके पश्चात प्रेक्षाध्यान और जप अनुष्ठान के प्रयोग कराए गए।

मंगल पाठ एवं मंगल संगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। पूरे आयोजन में मर्यादा, संयम, अनुशासन और संघ के प्रति निष्ठा के भाव प्रमुख रहे। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि मर्यादाओं का पालन केवल परंपरा का निर्वहन नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जीवन को श्रेष्ठ बनाने और परिवार, समाज तथा राष्ट्र में सद्भाव स्थापित करने का प्रभावी माध्यम है।