जयपुर : अणुविभा केंद्र, मालवीय नगर में चातुर्मासिक प्रवास कर रहे मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने सोमवार को आध्यात्मिक प्रवचन-श्रृंखला में निंदा और घृणा के सकारात्मक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए कहा कि घृणा व्यक्ति से नहीं, उसके पाप और कृत्य से होनी चाहिए। दूसरों की निंदा और घृणा जहां मन को कलुषित करती है, वहीं अपनी भूलों और त्रुटियों के प्रति ग्लानि तथा आत्मालोचना मनुष्य को आत्मशुद्धि की ओर ले जाती है।
मुनिश्री ने कहा कि निंदा और घृणा को केवल त्याज्य मान लेना पर्याप्त नहीं है। इनका एक सकारात्मक पक्ष भी है। दूसरों की निंदा छोड़ना और अपनी भूलों की निंदा करना—यही साधना का सार है। अपनी गलतियों के प्रति अनादर का भाव रखना, उन्हें स्वीकार करना और आवश्यक होने पर दूसरों के समक्ष प्रकट करना व्यक्ति को भीतर से निर्मल बनाता है। उन्होंने कहा कि अपनी भूलों पर ग्लानि होना आत्मशुद्धि का मार्ग है और यह साधना किसी तपस्या से कम नहीं।
तत्त्वज्ञान के संदर्भ में मुनिश्री ने तीन दृष्टियों की चर्चा करते हुए कहा कि सम्यक् दृष्टि धर्म, ध्यान और आत्म-विकास की आधारभूमि है। दृष्टि में परिवर्तन आने पर जीवन को देखने का ढंग भी बदल जाता है और यही परिवर्तन आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।
‘भरत मुक्ति’ गेय व्याख्यान के माध्यम से उन्होंने कर्म और उसके परिणामों को समझाते हुए कहा कि दूसरों के मार्ग में अन्तराय उत्पन्न करने वाला व्यक्ति स्वयं भी बाधाओं से घिरता है। जीवन में दूसरों के लिए मार्ग प्रशस्त करने का भाव ही अंततः अपने मार्ग को भी सुगम बनाता है।
इस अवसर पर संत श्री संभव कुमार जी महाराज ने कहा कि गलती इंसान से होती है, भगवान कभी गलती नहीं करते। मनुष्य की श्रेष्ठता इस बात में नहीं कि उससे कभी गलती न हो, बल्कि इस बात में है कि वह अपनी गलती से सीख ले और उसे दोहराए नहीं। जो व्यक्ति अपनी भूलों से सबक लेकर स्वयं को सुधारता है, वही वास्तविक अर्थों में समझदार और श्रेष्ठ इंसान है।
कार्यक्रम का शुभारंभ केवली भगवान अनंत प्रभु की स्तुति से हुआ। इसके पश्चात जप-अनुष्ठान तथा तप-त्याग के विभिन्न उपक्रम संपन्न हुए। प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने आध्यात्मिक साधना में सहभागिता की।
सामायिक साधना का विशेष उपक्रम शुरू
मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ की प्रेरणा से श्रावक-श्राविकाओं में सामायिक साधना का विशेष उपक्रम 9 अगस्त से प्रारंभ हुआ, जो 13 अगस्त तक चलेगा। इस साधना में बड़ी संख्या में श्रद्धालु सहभागी बन रहे हैं।
सामायिक साधना मनुष्य को बाहरी भागदौड़ से विराम देकर स्वयं के भीतर उतरने का अवसर देती है। नियमित साधना से जीवन में समता, संयम और सहनशीलता के भाव विकसित होते हैं। यही भाव मनुष्य को मानसिक शांति और समाधि की ओर ले जाते हैं। चातुर्मास के इस आध्यात्मिक वातावरण में सामायिक साधना श्रद्धालुओं के लिए आत्मनिरीक्षण और आत्मपरिष्कार का माध्यम बन रही है।








