शुश्रूषा से विनयवान होता है मानव : मानवता के मसीहा महाश्रमण

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लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सोमवार को प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘शुश्रूषा से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से वर्णित करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कि गुरु साधर्मिक शुश्रूषणा से जीव क्या प्राप्त करता है? धार्मिक जगत में गुरु का महत्त्वपूर्ण स्थान है और व्यावहारिक जगत में भी गुरु का अपना महत्त्व होता है। जो धर्मगुरु, सद्गुरु होते हैं, वे आध्यात्मिक ज्ञान देने वाले होते हैं, अज्ञान अंधकार को निवारित करते हैं और स्वयं त्यागी और संयमी होते हैं। आचार्य भी गुरु होते हैं। कहीं आचार्य और गुरु एक ही होते हैं। गुरु और साधर्मिक का अर्थ होता है कि एक धर्म को मानने वाले, समान धर्म में चलने वाले होते हैं। इनकी शुश्रूषा का एक अर्थ है सुनने की इच्छा। शुश्रूषा आदमी का एक गुण हो सकता है। आदमी में सुनने की इच्छा हो। कोई गुरु अथवा साधर्मिक कुछ कहना चाहते हैं तो उनकी बातों को सुनने का प्रयास होना चाहिए। इसलिए आदमी में सुनने की इच्छा रखने का प्रयास होना चाहिए।
यदि गुरु हैं, साधर्मिक हैं तो आदमी को ध्यान से सुनने का प्रयास करना चाहिए। यह विनय का एक गुण भी है। कोई बड़ा हो, गुरु ही हों अथवा कोई साधर्मिक बन्धु भी हैं और कोई बात कह रहे हैं तो उसे सुनने का प्रयास करना चाहिए। गुरु उपदेश रहे हों तो उनकी बातों को सुनने की इच्छा रखना चाहिए। कभी प्रवचन, व्याख्यान हो रहा हो तो उसे ध्यान से सुनने का प्रयास होना चाहिए। गुरु की सुनने की इच्छा और सेवा और परिचर्या करना तथा पर्युपासना करना बहुत अच्छी बात होती है।
इसी प्रकार कोई साधर्मिक बन्धु हैं, जो एक संघ के सदस्य हैं, एक गुरु के शिष्य हैं, एक धर्म को मानने वाले हैं तो उनकी बात को भी सुनने का प्रयास करना चाहिए। कोई छोटा हो तो भी किसी बैठक आदि में जो छोटा भी हो, उसका भी सुनने का प्रयास होना चाहिए। जो भी अपने आपसे बड़े हैं, उनके प्रति विनय का भाव रखना छोटे का कर्त्तव्य है। पक्खी के उपलक्ष में वंदना करना, खमतखामणा करना आदि की तेरापंथ धर्मसंघ में विशेष व्यवस्था है।
अपने साधर्मिक की सेवा, परिचर्या के योग्य हों, परिचर्या के अधिकारी हो गए हैं, उनकी सेवा और परिचर्या करने का प्रयास करना चाहिए। स्वयं का बहुत सौभाग्य की बात माननी चाहिए कि किसी साधर्मिक की सेवा का अवसर मिले। सेवा भी उत्साह के साथ कर देने का प्रयास करना चाहिए। सुनने की इच्छा रखना, पर्युपासना करना, सेवा-परिचर्या करना बहुत अच्छी बात होती है। इस प्रकार गुरु व साधर्मिक की शुश्रूषा करने से आदमी विनयवान बन सकता है। विनयवान बनना भी जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि होती है।
विनय करने वाले को कोई डिग्री मिले अथवा नहीं, किन्तु शुश्रूषा से विनय का भाव जीवन में आ जाता है, जो जीवन को मंगलमय बनाने वाला होता है। कहा भी गया है कि जो अभिवादनशील है, उसके आयुष्य, बल, बुद्धि और यश का निरंतर विकास होता है। विनयशील रहने वाला कभी अवज्ञा नहीं करता। उसका बहुत अच्छा व्यवहार होता है। जो विनयशील होता है, वह नरक गति, तिर्यंच गति में जाने से बचाव कर लेता है और मनुष्य जन्म भी प्राप्त करता है तो उसे सुकुल आदि प्राप्त हो सकता है। विनयशील लोकप्रिय हो सकता है। आत्मा की शुद्धि के लिए विनय प्रतिपन्न रहें, यह काम्य है।