डेस्क : महाराष्ट्र में नवरात्रि के दौरान गरबा और डांडिया कार्यक्रमों में मुस्लिम समुदाय के लोगों की भागीदारी को लेकर जारी विवाद के बीच शहजाद पूनावाला ने सवाल उठाया है कि जब हज और उमरा जैसे मुस्लिम धार्मिक आयोजनों का धार्मिक स्वरूप कायम है, तो गरबा के स्वरूप में बदलाव क्यों किया जा रहा है।
पूनावाला ने कहा कि गरबा मूल रूप से मां अंबे की आराधना से जुड़ा धार्मिक पर्व है। उन्होंने धार्मिक आयोजनों को उनके पारंपरिक स्वरूप में मनाने की वकालत करते हुए कहा कि धार्मिक पर्वों को धर्मनिरपेक्ष बनाने की प्रक्रिया पर विचार होना चाहिए।
गरबा की धार्मिक पहचान पर जोर
शहजाद पूनावाला ने कहा कि गरबा केवल नृत्य या मनोरंजन का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह देवी की आराधना से जुड़ा आयोजन है। उन्होंने धार्मिक आयोजनों की पहचान और परंपरा को बनाए रखने की जरूरत बताई।
उन्होंने यह भी आशंका जताई कि कुछ लोग गलत मंशा से अपनी पहचान छिपाकर ऐसे आयोजनों में शामिल हो सकते हैं। हालांकि, यह उनके द्वारा उठाई गई आशंका है, जिसका स्वतंत्र रूप से कोई प्रमाण सामने नहीं आया है।
महाराष्ट्र में पहले से जारी है विवाद
महाराष्ट्र में गरबा और डांडिया आयोजनों में मुस्लिमों की भागीदारी को लेकर पहले ही राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज है। विश्व हिंदू परिषद ने आयोजकों से प्रतिभागियों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए आधार कार्ड की जांच और तिलक लगाने जैसे कदम उठाने की अपील की है।
वहीं, इस रुख का विरोध भी हुआ है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) ने मुस्लिमों के प्रवेश पर रोक की मांग को असंवैधानिक बताया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की पत्नी अमृता फडणवीस ने भी कहा है कि यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति शांतिपूर्वक गरबा में शामिल होता है तो इसमें उन्हें कुछ गलत नहीं लगता।
इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के बयानों के बीच महाराष्ट्र में गरबा आयोजनों को लेकर विवाद और चर्चा लगातार बढ़ रही है।








