पूजा-सत्कार की भावनाओं से दूर होता है साधु : सिद्ध साधक आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी जैन विश्व भारती परिसर में योगक्षेम वर्ष का मंगल प्रवास कर रहे हैं। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में मानों आध्यात्मिक ठाट लगा हुआ है। बड़ी संख्या में चारित्रात्माओं की उपस्थिति श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक लाभ प्रदान कर रही है। अनेकानेक शिक्षा से संबंधित प्रकल्प, कक्षाओं, संगोष्ठी आदि के माध्यम से भी जन-जन को आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हो रहा है। इसके साथ ही देश भर के स्कूलों में जहां गर्मी की छुट्टियां हो गई हैं तो वहीं युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में बच्चों में अच्छे संस्कारों के वपन और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करने की शिविर व कक्षाओं का आयोजन हो रहा है। तेरापंथ समाज के बच्चों के लिए मानों गर्मी की छुट्टी का इससे उत्तम उपयोग हो ही नहीं सकता।

नित्य की भांति सोमवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘पूजा-सत्कार की चाह नहीं’ को वर्णित करते हुए कहा कि मन में प्रश्न हो सकता है कि साधु को कैसा होना चाहिए? शास्त्र में इसका उत्तर प्राप्त होता है कि जो सत्कार की इच्छा नहीं रखने वाला होता है। भिक्षु को ऐसी इच्छा रखनी भी नहीं चाहिए। साधु की ऐसी भी इच्छा नहीं होती कि उसकी कोई पूजा करे। इस प्रकार साधु न अपने सत्कार की अपेक्षा रखता है और न ही पूजा की अपेक्षा रखता है। साधु को स्वयं को वंदन करने की मांग भी नहीं करने वाला होता है। लोग तो स्वयं लाभ लेने के लिए साधु को वंदन करते हैं। वंदन करने से वंदन करने वाला का लाभ होता है। वंदना के लिए भी अलग-अलग नियम और विधियां भी निर्धारित हैं कि किसके समक्ष किस विधि से वंदन करना। वंदन के नियमों का भी ध्यान रखना अपेक्षित है। हमारे धर्मसंघ में विनय की परंपरा चलती आ रही है। धर्मसंघ में आचार्य व युवाचार्य को कितना मान-सम्मान मिलता है। इसके बावजूद भी साधु को मान-सम्मान, कीर्ति-ख्याति की आकांक्षा-लालसा नहीं रखनी चाहिए।

साधु को न तो सत्कार की अपेक्षा रखनी चाहिए और न ही उसे अपने वंदन, पूजन की आकांक्षा ही करनी चाहिए। विधि के अनुसार जो भी प्राप्त हो, उसे सहजतया ग्रहण करना चाहिए। साधु को इन सभी भावनाओं को दूर रहने और बचने का भी प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन के उपरान्त चारित्रात्माओं को जिज्ञासाओं को उत्तरित किया।

चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उपरान्त श्री धीरज बैद ने गीत का संगान किया। सघन साधना शिविर के शिविरार्थियों को भी अपने आराध्य के समक्ष अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत करने का अवसर मिला। आचार्यश्री ने उनकी जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए। अपने आराध्य के समक्ष अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने और उनके उत्तर प्राप्त करने का अवसर प्राप्त कर मानों सभी शिविरार्थी धन्यता की अनुभूति कर रहे थे।

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