डेस्क : अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल एचआर मैकमास्टर (सेवानिवृत्त) ने रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले देशों पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने की वकालत की है। हालांकि, भारत के मामले में उन्होंने कहा कि नई दिल्ली की सुरक्षा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अमेरिका को दबाव बनाने के बजाय रणनीतिक संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।
मैकमास्टर की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने रूस और ईरान के खिलाफ प्रतिबंधों से संबंधित लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट, 2026 को 262-159 मतों से पारित किया है। प्रस्तावित कानून के तहत रूस से तेल और गैस का आयात जारी रखने वाले देशों पर राष्ट्रपति को 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है।
एएनआई से बातचीत में मैकमास्टर ने इस कदम का समर्थन करते हुए कहा कि रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना जरूरी है, ताकि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को यह संदेश दिया जा सके कि युद्ध जारी रखना उनके लिए स्वीकार्य लागत पर संभव नहीं होगा। उन्होंने यूरोप में ड्रोन गतिविधियों, बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं और अन्य सुरक्षा चुनौतियों का भी उल्लेख किया।
हालांकि, जब उनसे पश्चिमी देशों की रूस के प्रति नीतियों में मौजूद विरोधाभासों पर सवाल किया गया तो मैकमास्टर ने अमेरिका द्वारा रूसी परमाणु ईंधन की खरीद को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि किसी शत्रुतापूर्ण सरकार को अपनी अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाने की क्षमता देना रणनीतिक रूप से उचित नहीं है। उन्होंने रूस से यूरेनियम खरीद को लेकर इसे बेहद गलत नीति बताया।
मैकमास्टर ने यह भी संकेत दिया कि कुछ महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं पर तत्काल निर्भरता समाप्त करना आसान नहीं होगा और ऐसे मामलों में छूट दिए जाने की संभावना हो सकती है।
भारत की सुरक्षा परिस्थितियों को समझने की जरूरत
भारत पर संभावित अमेरिकी दबाव के सवाल पर मैकमास्टर ने कहा कि भारत की स्थिति अन्य देशों से अलग है। उन्होंने कहा कि भारत के सामने पाकिस्तान और चीन जैसे दो परमाणु-सशस्त्र पड़ोसी हैं और ऐसे में रूस से संबंधों को तत्काल कमजोर करना नई दिल्ली के लिए रणनीतिक रूप से जटिल हो सकता है।
उन्होंने कहा कि भारत की रूस पर रक्षा और ऊर्जा संबंधी ऐतिहासिक निर्भरता को देखते हुए अमेरिका को भारतीय दृष्टिकोण को समझना चाहिए। मैकमास्टर ने भारत-अमेरिका संबंधों को और मजबूत करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
पाकिस्तान का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अमेरिका की ओर से पाकिस्तान की कथित दोहरी नीति को पर्याप्त रूप से पहचानने में अनिच्छा उनकी बड़ी निराशाओं में रही है। उनके अनुसार, क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ी ऐसी परिस्थितियां भारत और अमेरिका को एक-दूसरे के और करीब ला सकती हैं।
चीन को बताया दीर्घकालिक चुनौती
मैकमास्टर ने भारत और अमेरिका के संबंधों के भविष्य को चीन की क्षेत्रीय नीति से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि चीन हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ अपने प्रभाव को बढ़ाना चाहता है और भारत के लिए वास्तविक विकल्प केवल बीजिंग या वॉशिंगटन में से किसी एक को चुनना नहीं है, बल्कि अपनी संप्रभुता और रणनीतिक स्वतंत्रता को बनाए रखना है।
उन्होंने भारत से अमेरिका के साथ दीर्घकालिक संबंधों में विश्वास बनाए रखने की अपील की, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि अमेरिका को भारत पर रूस के खिलाफ तत्काल कोई पक्ष चुनने का दबाव नहीं बनाना चाहिए। उनके मुताबिक, भारत का रूस के साथ संबंध बनाए रखना या ब्रिक्स जैसे मंचों पर सक्रिय रहना दीर्घकालिक भारत-अमेरिका साझेदारी के संदर्भ में अलग-अलग मुद्दों के रूप में देखा जाना चाहिए।
इस बीच, भारत का विदेश मंत्रालय अमेरिकी टैरिफ संबंधी प्रस्ताव पर नजर बनाए हुए है। भारत लगातार अपनी ऊर्जा सुरक्षा और विविध स्रोतों से ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने पर जोर देता रहा है। भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता भी जारी रहने की संभावना है। दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय व्यापार वार्ता 30 सितंबर और 1 अक्टूबर को विस्कॉन्सिन में होने वाली जी-20 व्यापार मंत्रियों की बैठक के दौरान आगे बढ़ने की उम्मीद है।








