लाडनूं : जैन विश्व भारती की आध्यात्मिक धरा पर इन दिनों साधना और संस्कारों और अनूठा संगम देखने को मिल रहा है, जहाँ गतिमान योगक्षेम वर्ष के चलते एक विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा प्रवाहित हो रही है। अणुव्रत अनुशास्ता युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के क्रम में आज समापन अवसर पर जीवन विज्ञान दिवस का आयोजन हुआ।
कार्यक्रम में आज सेठ सूरजमल भूतोदिया राजकीय कन्या विद्यालय एवं सुभाष बोस इंग्लिश मीडियम स्कूल के छात्र-छात्राएं एवं शिक्षकगण विशेष रूप से उपस्थित थे। विद्यार्थियों ने अणुव्रत गीत का संगान किया एवं प्रार्थना सभा में होने वाले जीवन विज्ञान के उपक्रम की प्रस्तुति दी। आचार्यप्रवर की प्रेरणा से विद्यार्थियों ने नशा मुक्ति का संकल्प स्वीकार किया।
इसके साथ-साथ रात्रिकालीन व्याख्यान का भी जन मानस में विशेष आकर्षण छाया हुआ है, जहाँ रात्रि में युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी द्वारा संगीत शैली में किया जा रहा ‘रामायण’ का वाचन श्रोताओं के कानों में अमृत घोल रहा है। यह कर्णप्रिय कथा प्रसंग का श्रद्धालु अपार आनंद व भाव-विभोर होकर इसका श्रवण कर रहे हैं।
मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने धर्म देशना देते हुए कहा – शिक्षा जीवन का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है, जो ज्ञान के विकास, चिंतनशीलता, सही निर्णय लेने की क्षमता और समझदारी को बढ़ाती है। आज दुनिया में स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का बड़ा जाल फैला हुआ है और साधु-संतों के समुदाय में भी शिक्षा की एक सुदृढ़ परंपरा रही है। 90 वर्ष पहले की स्थिति की तुलना में आज साधु-साध्वियों में शिक्षा के प्रति रुझान काफी बढ़ा है। पहले के समय में अंग्रेजी बोलने वाले या उच्च उपाधि प्राप्त करने वाले चारित्रआत्मा बहुत कम थे, लेकिन आज अनेक चारित्रात्माएं अंग्रेजी में संवाद करने, लिखने और अनुवाद करने में सक्षम हैं। आज हमारे समुदाय में एमए, डॉक्टरेट, सीए और वकालत जैसी उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले संत-साध्वियां और समणियां उपलब्ध हैं, जो शिक्षा के क्षेत्र में आए एक बड़े सकारात्मक बदलाव को दर्शाता है।
गुरुदेव ने आगे कहा कि अणुव्रत और प्रेक्षाध्यान का मिला-जुला रूप ही जीवन विज्ञान है। यह एक गैर-सांप्रदायिक उपक्रम है, जिसका उद्देश्य शिक्षा जगत में संस्कारयुक्त शिक्षा प्रदान करना है। यह कार्य किसी भी विद्यालय या शिक्षण संस्थान में सहजता से किया जा सकता है, जिसके लिए बहुत अधिक औपचारिक प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं है। इसके द्वारा विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।
‘महाप्राण ध्वनि’ जैसे सरल अभ्यास जीवन विज्ञान का एक महत्त्वपूर्ण अंग हैं। यह न केवल भावनात्मक विकास में सहायक है, बल्कि क्रोध, अहंकार और प्रमाद जैसी विकृतियों पर नियंत्रण पाने में भी मदद करता है। जीवन विज्ञान का मूल उद्देश्य शिक्षा के साथ उत्तम संस्कारों का निर्माण करना है। यह कार्यक्रम केवल जैन समाज तक सीमित नहीं है, इसका अपना व्यापक रूप है। शिक्षा के तीन प्रमुख आयाम हैं: पहला, विश्वविद्यालयीन शिक्षा जैसे बीए, एमए, पीएचडी आदि। दूसरा हमारा संघीय पाठ्यक्रम है महाप्रज्ञ श्रुताराधना का और तीसरा, महिला मंडल के माध्यम से तत्त्वज्ञान का अध्ययन भी क्रम चलाया जा रहा है।
कार्यक्रम में मुनि योगेशकुमारजी ने विचारों की अभिव्यक्ति दी। अणुव्रत समिति लाडनूं के अध्यक्ष श्री शांतिलाल बैद, श्री राजेश खटेड ने अपने विचार रखे।








