संयम साधना में सहयोगी श्रावक-श्राविका साधु-संतों के मां-बाप तुल्य : मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’

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जयपुर : मालवीय नगर स्थित अणुविभा केंद्र में मंगलवार को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ की मर्यादाओं एवं संविधान वाचन का कार्यक्रम श्रद्धा और आध्यात्मिक वातावरण में आयोजित हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।

मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने धर्मसंघ की मर्यादाओं का वाचन करते हुए कहा कि आचार्य भिक्षु इस धर्मसंघ के संस्थापक, आदि गुरु एवं मर्यादाओं के निर्माता हैं। उन्होंने लगभग ढाई सौ वर्ष पूर्व जिन मर्यादाओं का निर्माण किया था, वे आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। ये मर्यादाएं धर्मसंघ की एकता, अखंडता और पवित्रता का आधार हैं।

मुनिश्री ने कहा कि साधु-साध्वियों के लिए निर्धारित इन मर्यादाओं के मूल भाव को यदि परिवार, समाज और संस्थाओं के जीवन में भी अपनाया जाए तो स्वस्थ परिवार और स्वस्थ समाज की रचना संभव है। साधुचर्या में श्रावक-श्राविकाओं की भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि साधु-संतों की आवश्यकताओं की पूर्ति श्रावक-श्राविकाओं के सहयोग से होती है। संयम-साधना में सहयोग करने वाले श्रावक-श्राविकाओं को साधु-संतों के लिए मां-बाप के समान माना गया है।

जागरूक श्रावक संघ की शक्ति : मुनिश्री संभव कुमार

मुनिश्री संभव कुमार जी महाराज ने कहा कि साधु-संतों के प्रति श्रद्धालुओं के मन में आज भी गहरी आंतरिक श्रद्धा विद्यमान है। साधु त्याग और वैराग्य का जीवन जीते हुए संयम-साधना करते हैं, लेकिन वे छद्मस्थ साधक हैं, इसलिए उनसे भी कभी भूल होना स्वाभाविक है। वीतरागी से गलती नहीं होती, जबकि छद्मस्थ साधक से भूल संभव है। इसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है।

उन्होंने कहा कि जागरूक और हितैषी श्रावक को यदि साधु की कोई भूल ध्यान में आए तो उसका उद्देश्य आलोचना नहीं, बल्कि सावधान करना होना चाहिए। गलतियों की उपेक्षा करना अथवा उन्हें बढ़ावा देना, दोनों ही धर्मसंघ के हित में नहीं हैं।

मुनिश्री ने कहा कि प्रत्येक चतुर्दशी को परिषद के बीच मर्यादाओं का वाचन करने का उद्देश्य यही है कि साधु-साध्वियों के साथ श्रावक-श्राविकाएं भी धर्मसंघ की मर्यादाओं और उसके प्रति अपनी निष्ठा एवं वफादारी को सदैव जागृत रखें।

कार्यक्रम में युवरत्न श्री मर्यादा कुमार कोठारी ने श्रावक निष्ठा पत्र का वाचन किया। तीर्थंकर धर्म प्रभु की स्तुति के साथ प्रवचन कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। सामायिक पचरंगी की साधना के क्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु सहभागी बने। संतों के सान्निध्य में तप, त्याग और आध्यात्मिक साधना का क्रम भी जारी रहा।

चौविहार संथारे में दिवंगत मंजुला जी गुजरानी को श्रद्धांजलि

अणुविभा केंद्र में धर्मसभा के पश्चात स्मृति सभा का आयोजन भी किया गया। सरदारशहर निवासी एवं जयपुर प्रवासी श्री मनोज गुजरानी की माताजी श्रीमती मंजुला जी गुजरानी का पिछले दिनों चौविहार संथारे में देहावसान हुआ था। उनकी स्मृति में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में समाजजनों ने दिवंगत आत्मा के प्रति श्रद्धा एवं भावांजलि अर्पित की।

इस अवसर पर जैन श्वेताम्बर तेरापंथ सभा के मंत्री श्री राजकुमार जी बाफना, श्री संचय जी जैन, श्रीमती कौशल्या जी, सुश्री अवनि जी, श्रीमती आयुषी जी, श्री राजेन्द्र जी बांठिया, श्री हेमराज जी चौरड़िया सहित अनेक श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक भावांजलि दी।

कार्यक्रम में आचार्य श्री महाश्रमण जी, साध्वी प्रमुखा जी सहित विभिन्न सभा-संस्थाओं की ओर से प्रेषित शोक संदेशों का वाचन एवं उल्लेख किया गया। संतों ने दिवंगत आत्मा के आध्यात्मिक विकास की मंगलकामना करते हुए परिवारजनों को धैर्य, संयम और मनोबल बनाए रखने की प्रेरणा दी।

धर्मसभा का वातावरण श्रद्धा, संयम और आध्यात्मिक चेतना से ओतप्रोत रहा।