लाडनूं : तेरापंथ की राजधानी लाडनूं की धरा पर विराजमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शांतिदूत, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी विशाल धवल सेना के साथ तेरापंथ धर्मसंघ के दूसरे योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत मंगल प्रवास कर रहे हैं। आचार्यश्री के विराजमान होने जाने से सम्पूर्ण लाडनूं नगर का वातावरण आध्यात्मिक ज्योति से आलोकित हो रहा है। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अनेकानेक आयोजन भी भव्य रूप में सुसम्पन्न हो रहे हैं। वर्तमान समय में भी शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर आध्यात्मिक अनुष्ठान भी गतिमान है। गुरुवाणी को अपने जीवन में उतारकर अपने जीवन को धन्य बनाने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु निरंतर आध्यात्मिक प्रेरणा का लाभ प्राप्त कर रहे हैं।
मंगलवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को तेरापंथ के वर्तमान अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय: सद्भाव प्रत्याख्यान से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि प्रश्न पूछा गया कि सद्भाव प्रत्याख्यान से जीव क्या प्राप्त करता है? उत्तर देते हुए कहा कि धार्मिक जगत में प्रत्याख्यान की बात होती है। इस वस्तु का प्रत्याख्यान करो, अमुक चीज को छोड़ दो आदि-आदि कितने प्रकार छोटे-मोटे त्याग किए जा सकते हैं। आदमी शुभ योगों का सेवन करता है। मन, वचन और काय से शुभ प्रवृत्ति करते हैं तो पाप कर्म झड़ते हैं और पुण्य कर्म का बंध, दोनों ही कार्य होते हैं। सद्भाव प्रत्याख्यान ऐसा प्रत्याख्यान है कि इसके बाद कोई भी आश्रव प्रत्याख्यान नहीं बचता। सद्भाव प्रत्याख्यान से जीव अनिवृत्ति को प्राप्त हो सकता है। सद्भाव प्रत्याख्यान से जीव सिद्ध हो जाता है, बुद्ध हो जाता है, मुक्त हो जाता है।
यह प्रत्याख्यानों में सभी बड़ा प्रत्याख्यान है। यह साधना का शिखर है। जब तक प्रवृत्तियां होती हैं तो मानना चाहिए कि साधना की शिखर अवस्था नहीं है। सद्भाव प्रत्याख्यान वाले साधना के शिखर पुरुष सद्भाव प्रत्याख्यान करने वाले साधु हो सकते हैं। राग-द्वेष की मुक्ति तो मानों सभी के लिए आवश्यक ही है। इसके बिना मुक्ति ही नहीं हो सकती। इसके लिए श्वेताम्बर, दिगम्बर, आदि-आदि की आवश्यकता नहीं, जिसने राग-द्वेष कषाय अर्थात् राग-द्वेष से मुक्त हो जाता है, वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि अभी सघन साधना शिविर भी लगा हुआ है। इस वर्ष में यह आयोजन दूसरी बार हो रहा है। सघन साधना करना भी जीवन में अच्छी हो जाए और भीतर में मुमुक्षा की भावना जाग जाए तो यह सघन साधना निष्पत्तिपूर्ण हो सकती है। मुमुक्षा की भावना जागे अथवा न भी जागे, लेकिन इसके माध्यम से साधना का कम से कम अवसर तो प्राप्त हो रहा है। इसके माध्यम से कुछ अंशों में संयम की साधना का अवसर मिल सकता है। इसमें छोटे बच्चे भी भाग ले रहे हैं, बहुत अच्छी बात है। सघन साधना शिविर के संभागियों में संयम की साधना का अभ्यास हो, ऐसा प्रयास होना चाहिए।
मंगल प्रवचन से पूर्व आध्यात्मिक नवरात्र के संदर्भ में मंत्र जप के आध्यात्मिक अनुष्ठान का भी उपक्रम रहा, जिसमें आचार्यश्री द्वारा निर्धारित मंत्रों के उच्चारण किया तो चतुर्विध धर्मसंघ ने भी अपने आराध्य का अनुसरण इस आध्यात्मिक अनुष्ठान से स्वयं को जोड़ अपने जीवन को धन्य बनाया। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने सघन साधना शिविर के शिविरार्थियों को अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत करने का अवसर भी प्रदान किया। अनेक शिविरार्थियों ने अपनी जिज्ञासाएं आचार्यश्री के समक्ष प्रस्तुत कीं, जिसे आचार्यश्री ने उत्तरित किया।








