जयपुर : नवरात्रि का आध्यात्मिक पर्व आत्मशुद्धि, साधना और जीवन को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा देता है। इसी क्रम में मालवीय नगर स्थित अणुविभा केन्द्र के महाप्रज्ञ सभागार में मंगलवार को नवरात्रि आध्यात्मिक अनुष्ठान के तीसरे दिन ‘व्यवहार: सफलता का आधार और व्यक्तित्व की पहचान’ विषय पर विशेष सेमिनार आयोजित किया गया। मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ एवं मुनिश्री संभव कुमार जी के पावन सान्निध्य में आयोजित इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने सद्व्यवहार, आत्मावलोकन, विनम्रता और आंतरिक पवित्रता के महत्त्व पर प्रकाश डाला।
मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि व्यक्तित्व की वास्तविक पहचान व्यक्ति के व्यवहार से होती है। मनुष्य की सोच, विचार और आचरण में एकरूपता होनी चाहिए। केवल बाहरी शालीनता और अच्छे व्यवहार का प्रदर्शन किसी व्यक्ति को श्रेष्ठ नहीं बना सकता, बल्कि उसके अंतर्मन की पवित्रता और विचारों की निर्मलता ही उसके चरित्र को वास्तविक गरिमा प्रदान करती है।
उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति के विचार और व्यवहार में अंतर होता है, तो उसके व्यक्तित्व में दोहरापन दिखाई देने लगता है। ऐसा आचरण समाज में उसकी विश्वसनीयता को प्रभावित करता है। इसलिए जीवन में व्यवहार को बेहतर बनाने के लिए आत्मावलोकन आवश्यक है। व्यक्ति को समय-समय पर अपने विचारों, भावनाओं और आचरण का निरीक्षण करना चाहिए। बाहरी व्यक्तित्व को संवारने के साथ-साथ मन की पवित्रता पर ध्यान देना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।
जीवन को सुंदर बनाना हमारे अपने हाथ में है
मुनिश्री संभव कुमार जी ने जीवन जीने की कला पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शरीर का रंग-रूप प्रकृति की देन है, लेकिन जीवन को किस दिशा में ले जाना है और अपने आचरण को कितना सुंदर बनाना है, यह हमारे अपने हाथ में है। मनुष्य की श्रेष्ठता उसके बाहरी स्वरूप से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार, विनम्रता और सरलता से प्रकट होती है।
उन्होंने कहा कि मधुर वाणी, अहंकार से मुक्ति और सभी के प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार व्यक्ति को समाज में सम्मान और आत्मीयता दिलाते हैं। जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए योग्यता के साथ अच्छे संस्कार और मानवीय संवेदनाएं भी आवश्यक हैं। जो व्यक्ति दूसरों के प्रति सम्मान का भाव रखता है, वह अपने व्यवहार से संबंधों को मजबूत बनाता है और समाज में सकारात्मक वातावरण का निर्माण करता है।
स्तुति, जप और प्रेक्षा के प्रयोगों से आध्यात्मिक वातावरण
कार्यक्रम का शुभारंभ नौवें तीर्थंकर भगवान सुविधिनाथ प्रभु की भावपूर्ण स्तुति के साथ हुआ। इसके पश्चात नवरात्रि जप अनुष्ठान की साधना का क्रम जारी रहा। उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को श्वास प्रेक्षा एवं महाप्राण ध्वनि के विशेष आध्यात्मिक प्रयोग करवाए गए। मुनिश्री जी ने ‘तीन शिक्षाएं’ विषय पर प्रेरक व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए जीवन में आध्यात्मिक मूल्यों और सदाचरण की उपयोगिता को समझाया।
मंगल मधुर संगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। सेमिनार ने उपस्थित जनसमुदाय को यह संदेश दिया कि जीवन की वास्तविक सुंदरता बाहरी आडंबर में नहीं, बल्कि विचारों की निर्मलता, वाणी की मधुरता और व्यवहार की श्रेष्ठता में निहित है।








