लाडनूं। जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में योगक्षेम वर्ष की आराधना करते हुए चतुर्विध धर्मसंघ आध्यात्मिक ऊर्जा और तप साधना से भावित हो रहा है। साधु साध्वियां एवं श्रावक समाज द्वारा तपस्याओं का क्रम भी जारी है। इसी कड़ी में साध्वी स्मितप्रभा जी ने गुरुदेव से 28 दिन की तपस्या (मासखमण) का प्रत्याख्यान किया। कार्यक्रम में सघन साधना शिविर के शिविरार्थियों ने भी अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासाएं रखीं और पूज्य प्रवर के श्रीमुख से उनका समाधान प्राप्त कर अपने साधना-पथ को प्रशस्त किया। प्रवचन के प्रारंभ में नवान्हिक आध्यात्मिक अनुष्ठान का भी क्रम रहा।
मुख्यप्रवचन कार्यक्रम में आचार्यश्री ने आगमवाणी के आलोक में ‘भक्त प्रत्याख्यान से जीव क्या प्राप्त करता है?’ विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा- भक्त प्रत्याख्यान का अर्थ है आहार का प्रत्याख्यान कर देना। सामान्यतः भोजन गृहस्थों और साधुओं दोनों के लिए आवश्यक है, लेकिन भक्त प्रत्याख्यान के माध्यम से साधक आहार और पानी का त्याग कर देता है। आचार्य भिक्षु ने भी अनशनपूर्वक पंडित मरण को प्राप्त किया था। जैन शासन में संथारे का बहुत महत्त्व है। अनशन के भेदों में एक भेद भक्त प्रत्याख्यान है अन्य दो इंगिनीमरण और पादोपगमन है। भक्त प्रत्याख्यान विशिष्ट है, इंगिनी मरण विशिष्टतर है, और पादपोपगमन सबसे विशिष्टतम अनशन है, जिसमें साधक निश्चेष्ट होकर स्थित हो जाता है। भक्त प्रत्याख्यान का लाभ अत्यंत आश्चर्यकारी बताया गया है कि यह सैकड़ों भवों का निरोध कर देता है। संथारा लेने से जीव भव-भ्रमण से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। यदि शरीर की स्थिति बहुत कमजोर हो जाए, तो साधक को संलेखना और संथारा लेकर अपने कल्याण की तैयारी करनी चाहिए। आहार की आसक्ति का त्याग करना और शरीर के प्रति ममत्व का भाव छोड़ना, भव-भ्रमण को सीमित करने का उपाय है, अंतिम समय में स्वर्ग या देवलोक की आकांक्षा के बिना, केवल मोक्ष की भावना रखना ही सच्चा धर्मध्यान है।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि जब उम्र बढ़ जाए और शरीर अधिक यात्रा या श्रम करने में अक्षम हो जाए, तब व्यक्ति को धर्म-साधना पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए। एक उम्र के बाद स्वाध्याय, तप और जप में लग जाना चाहिए। ताकि आगे की तैयारी अच्छी रहे। प्रसंगवश आचार्यप्रवर ने फरमाया कि आज आश्विन शुक्ला द्वितीया है, जो मुनि श्री मधुकर जी स्वामी की 18वीं पुण्यतिथि है। मुनि श्री मधुकर जी स्वामी ने गुरुदेव तुलसी की सेवा में अपना जीवन समर्पित किया था, जिसमें स्वास्थ्य की देखभाल, आहार व्यवस्था और प्रतिलेखन जैसे कार्यों में उनका अतुलनीय योगदान रहा। उनका व्यक्तित्व अत्यंत मृदु और कुशल था, और उन्होंने गुरुदेव तुलसी व आचार्य महाप्रज्ञ जी की सेवा कर गण में गौरव पाया। उन्हें गुरुदेव ने ‘संघ परामर्शक’ जैसे गरिमापूर्ण अलंकरण से सम्मानित किया था। उनकी आज मैं स्मृति कर रहा हूँ, मुनिश्री की आत्मा जहाँ भी हो, खूब शांति और समाधि में रहे और जल्दी ही मोक्षश्री का वरण करे, यही कामना है।








