सीएम योगी का बड़ा बयान: राष्ट्र रक्षा के लिए शस्त्र उठाने को भी रहें तैयार

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डेस्क : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए आवश्यकता पड़ने पर संघर्ष करने की तैयारी रखने का आह्वान किया। वाराणसी में भारत सेवाश्रम संघ के शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि शस्त्र केवल पूजन की वस्तु नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र की रक्षा के लिए भी आवश्यकता पड़ने पर इन्हें धारण करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

सीएम योगी ने कहा कि एक संन्यासी के जीवन का ध्येय धन के लिए धर्म का त्याग करना नहीं, बल्कि धर्म के प्रति समर्पित रहना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि युद्ध छिड़ने पर संन्यासी को भी राष्ट्र की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए। देश और धर्म के लिए किया गया प्रत्येक त्याग महान है।

शांति के साथ राष्ट्र रक्षा भी जरूरी

मुख्यमंत्री ने कहा कि शांति के समय धर्म का स्वरूप संयम, सौहार्द और लोककल्याण होता है। लेकिन जब राष्ट्र और धर्म की रक्षा का प्रश्न सामने आए, तो आवश्यकता पड़ने पर संघर्ष के लिए भी तैयार रहना चाहिए। उन्होंने भारत सेवाश्रम संघ की परंपराओं और उसके सेवा कार्यों की सराहना की।

सनातन परंपरा और राष्ट्रीय चेतना पर जोर

योगी आदित्यनाथ ने संघ के संस्थापक स्वामी प्रणवानंद के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने सनातन मूल्यों और ऋषि परंपरा के प्रसार के साथ आध्यात्मिक साधना को राष्ट्रीय जागरण से जोड़ने का कार्य किया। उन्होंने कहा कि संघ ने कठिन परिस्थितियों में भी अपने मूल्यों और सिद्धांतों को बनाए रखा है।

मुख्यमंत्री ने काशी विश्वनाथ मंदिर और राम जन्मभूमि का उल्लेख करते हुए कहा कि जब कोई राष्ट्र संकट में होता है, तो उसकी आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत भी प्रभावित होती है। उन्होंने आपसी बंटवारे को देश के लिए नुकसानदायक बताते हुए राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर जोर दिया।

100 परिवारों को दी गईं सिलाई मशीनें

कार्यक्रम के दौरान भारत सेवाश्रम संघ की ओर से 100 परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से सिलाई मशीनें प्रदान की गईं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं पांच परिवारों को सिलाई मशीनें सौंपीं और संस्था के इस प्रयास की सराहना की।

उन्होंने कहा कि जरूरतमंद परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में ऐसे प्रयास महत्वपूर्ण हैं। समाजसेवा, लोककल्याण और राष्ट्र के प्रति समर्पण ही आध्यात्मिक साधना को सार्थक बनाते हैं।