जयपुर : जीवन में सफलता केवल परिश्रम से नहीं, बल्कि मन की एकाग्रता, समय के सदुपयोग और व्यवस्थित दिनचर्या से प्राप्त होती है। जब मन स्थिर होता है, तब व्यक्ति अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाकर लक्ष्य की ओर आगे बढ़ सकता है। यह प्रेरक संदेश गुरुवार को मालवीय नगर स्थित अणुविभा केन्द्र में आयोजित विशेष आध्यात्मिक धर्मसभा में मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने दिया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि मन की चंचलता व्यक्ति की असफलता के प्रमुख कारणों में से एक है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में स्थायी सफलता प्राप्त करने के लिए चित्त की एकाग्रता आवश्यक है। मन को भटकाव से बचाकर लक्ष्य पर केंद्रित करना ही सफलता की दिशा में पहला कदम है।
अव्यवस्थित दिनचर्या आत्म-विकास में बाधक
वर्तमान जीवनशैली में बढ़ती भागदौड़ और अव्यवस्था पर चिंता व्यक्त करते हुए मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि जब व्यक्ति के सोने और जागने का समय निश्चित नहीं होता, तो उसके जीवन और कार्यों में भी अनुशासन बनाए रखना कठिन हो जाता है। आत्म-विकास के लिए दिनचर्या में नियमितता और समय के प्रति सजगता आवश्यक है।
भगवान महावीर की देशना का उल्लेख करते हुए उन्होंने सूर्योदय से पूर्व तथा सूर्यास्त के बाद के समय को आत्मचिंतन, साधना और आध्यात्मिक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि प्रातःकाल की शांत बेला में व्यक्ति अपने भीतर झांक सकता है और अपनी सुप्त आत्मशक्ति को जाग्रत करने का प्रयास कर सकता है। नियमित साधना मन को शांत करने के साथ जीवन में सकारात्मकता भी लाती है।
समय और तन्मयता से मिलती है सफलता
इस अवसर पर मुनिश्री संभव कुमार जी ने आत्मसाक्षात्कार और साधना के विभिन्न सूत्रों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि साधना की उत्कृष्टता के लिए द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अनुकूलता महत्वपूर्ण है। किसी भी कार्य का परिणाम इस बात पर भी निर्भर करता है कि उसे किस समय, किस परिस्थिति और किस मनःस्थिति में किया जा रहा है।
मुनिश्री संभव कुमार जी ने समय के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि उचित समय पर किया गया कार्य बेहतर परिणाम देने में सहायक होता है। जब व्यक्ति पूरे मन, समर्पण और तन्मयता के साथ अपने कार्य में जुटता है, तो सफलता की राह आसान हो जाती है।
‘तीन शिक्षाएं’ के माध्यम से दिया संयम का संदेश
कार्यक्रम का शुभारंभ नवकार महामंत्र के सस्वर पाठ और नवरात्रि आध्यात्मिक अनुष्ठान के साथ हुआ। इसके बाद 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर की स्तुति की गई और मुख्य प्रवचन प्रारंभ हुआ।
मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने आगम आधारित ‘तीन शिक्षाएं’ विषय पर प्रवचन देते हुए श्रद्धालुओं को क्रोध, आवेश और जल्दबाजी में निर्णय लेने से बचने की प्रेरणा दी। उन्होंने जीवन में विवेक, धैर्य और आत्मसंयम के महत्व को समझाते हुए कहा कि परिस्थितियां कैसी भी हों, व्यक्ति को अपनी मनःस्थिति पर नियंत्रण बनाए रखना चाहिए।
आध्यात्मिक वातावरण में आयोजित इस कार्यक्रम का समापन मंगल शरण के पवित्र उच्चारण के साथ हुआ। धर्मसभा में दिए गए संदेश ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, अनुशासित जीवन और मन की एकाग्रता के माध्यम से स्वयं को बेहतर बनाने की प्रेरणा दी।








