सिद्धत्व की प्राप्ति के लिए जरूरी है अकषाय होना : आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में जैन विश्व भारती का वातावरण निरंतर आध्यात्मिक ऊर्जा से आप्लावित हो रहा है। कल से प्रारंभ हो रहे शक्ति व साधना के महापर्व नवरात्र के उपलक्ष्य में आगामी 10 दिनों तक विशेष आध्यात्मिक अनुष्ठान किया जाएगा। रात्रिकालीन व्याख्यान के अंतर्गत युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी के मुखारविंद से मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम के पावन जीवन-प्रसंगों पर आधारित ‘रामायण’ वाचन का क्रम भी निरंतर गतिमान है, जिसे श्रवण कर श्रद्धालु भाव-विभोर हो रहे हैं।

मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में ‘शरीर प्रत्याख्यान से क्या मिलेगा ?’ विषय को व्याख्यायित करते हुए युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने कहा कि जैन तत्त्वविद्या में शरीर के पाँच प्रकार बताए गए हैं- औदारिक, वैक्रिय, आहारक, तैजस और कार्मण। हमारी अनंत काल की इस भव-भ्रमण की यात्रा में शरीर हमेशा साथ रहता है। कार्मण शरीर सबसे सूक्ष्मतर है, जो कर्मों का समूह है और भव-भ्रमण का हेतु बनता है। जीव कार्मण शरीर के वशीभूत होकर परतंत्र रहता है। पाँचों शरीरों में से संज्ञी मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसमें समुच्चय रूप में पाँचों शरीर उपलब्ध हो सकते हैं। आहारक शरीर केवल संज्ञी मनुष्य और उसमें भी विशेष योग्य साधु को ही मिल सकता है, जो प्रश्न का समाधान पाने में एक दूत की भाँति कार्य करता है। वहीं तैजस और कार्मण शरीर संसारी जीवों के साथ प्रत्येक समय साथ रहने वाले हैं। औदारिक शरीर केवल मनुष्य और तिर्यंच गति में उपलब्ध होता है। औदारिक शरीर ही वह विशिष्ट आधार है जिसकी अवस्था में केवलज्ञान और केवलदर्शन की प्राप्ति संभव है। मोक्ष की प्राप्ति के लिए कषाय प्रत्याख्यान, योग प्रत्याख्यान और शरीर प्रत्याख्यान की एक क्रमिक श्रृंखला आवश्यक है। शरीर प्रत्याख्यान अंतिम चरण है, उससे पहले योग प्रत्याख्यान और कषाय प्रत्याख्यान का होना अनिवार्य है। कषाय प्रत्याख्यान बारहवें गुणस्थान में क्षय के रूप में पूर्ण होता है, जिसके बाद कषाय का उदय पुनः नहीं होता। जब तक कषाय प्रत्याख्यान न हो, शरीर प्रत्याख्यान पूर्ण रूप से संभव नहीं है। सिद्धत्व की प्राप्ति के लिए अशरीरी होना आवश्यक है और यह तभी संभव है जब कषाय और योग का पूर्ण प्रत्याख्यान हो जाए।

आचार्यप्रवर ने आगे विश्लेषण करते हुए कहा कि शरीर प्रत्याख्यान का परम लाभ यह है कि जीव परम सुखी बन जाता है। शरीर का प्रत्याख्यान करने से जीव सिद्ध गुणों को प्राप्त कर लेता है और लोकाग्र में जाकर परम सुखी हो जाता है। यह सुख शाश्वत है, जो देवों और इंद्रों के सुख से भी परे है। साधु-संतों की चित्त-समाधि के लिए भाव-शुद्धि और उपादान की मजबूती अनिवार्य है। यदि स्वयं का उपादान अच्छा है, तो बाहरी निमित्त भी समाधि को भंग नहीं कर सकते। सहन करना, औचित्यपूर्ण कहना और शांति से रहना। यह शांतिपूर्ण सहवास का सूत्र है। सिद्ध भगवान के चार अघाती कर्मों के क्षय से उनमें अनंत चतुष्टय प्रकट होते हैं। ज्ञानावरण और दर्शनावरण के क्षय से केवलज्ञान और केवलदर्शन, मोहनीय के क्षय से पूर्ण आत्म-शुद्धि तथा अंतराय कर्म के क्षय से अनंत वीर्य की प्राप्ति होती है। वर्तमान में पूर्ण परम सुखी भूमिका में न होने पर भी, समता की भावना से युक्त साधना के द्वारा सुख-दुख और लाभ-अलाभ में शांतिमय, वैराग्यमय और आनंदमय जीवन जिया जा सकता है। साधु का जीवन वासना से विरत और सहज प्रसन्नता से युक्त होना चाहिए, जिससे सभी परम सुखी बनने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ सकें।