अब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) इस कानूनी सवाल के लिए एक नई बेंच का गठन करेंगे। हालांकि, इस बीच कोर्ट ने 2020 दिल्ली दंगों के दो अन्य आरोपियों (तस्लीम अहमद और खालिद सैफी) को मामले के निपटारे तक 6 महीने की अंतरिम जमानत दे दी है।
UAPA मामलों की टाइमलाइन
इस कानूनी विवाद की जड़ें पिछले कुछ सालों के बड़े फैसलों से जुड़ी हैं।
2021 (केए नजीब केस): सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला दिया था। इसमें माना गया कि अगर ट्रायल में बहुत ज्यादा देरी हो रही है, तो मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 21) के तहत UAPA में भी जमानत दी जा सकती है।
जनवरी 2026: दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका इसी आधार पर खारिज हुई कि उनका अपराध गंभीर था और केवल समय बीतने पर जमानत नहीं मिल सकती।
मई 2026 (अंद्राबी केस): दूसरी बेंच ने कहा कि ट्रायल में देरी होने पर जमानत मिलनी ही चाहिए, जिससे यह मौजूदा विरोधाभास पैदा हुआ।
22 मई 2026: सुप्रीम कोर्ट ने जमानत के इस अहम मामले को अंतिम और स्पष्ट फैसले के लिए ‘लार्जर बेंच’ के पास रेफर कर दिया।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1: UAPA क्या है?
Ans: UAPA का पूरा नाम ‘गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम’ (Unlawful Activities Prevention Act) है। यह भारत का सबसे प्रमुख आतंकवाद निरोधी कानून है, जिसका मुख्य उद्देश्य देश की संप्रभुता और अखंडता को खतरे में डालने वाली आतंकी गतिविधियों को रोकना है।
Q2: UAPA की धारा 43D(5) क्या कहती है?
Ans: यह धारा UAPA के तहत जमानत के नियमों को बेहद सख्त बनाती है। इसके अनुसार, अगर जांच एजेंसी (जैसे NIA या पुलिस) द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों को देखकर कोर्ट को लगता है कि आरोप ‘प्रथम दृष्टया सही’ (Prima Facie True) हैं, तो आरोपी को किसी भी हाल में जमानत नहीं दी जा सकती।
Q3: क्या UAPA में जमानत मिलना बिल्कुल असंभव है?
Ans: असंभव नहीं है, लेकिन बहुत मुश्किल है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों के अनुसार, यदि मुकदमे (Trial) में बेवजह बहुत ज्यादा समय लग रहा हो और कैदी लंबे समय से बिना सजा के जेल में हो, तो उसे मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 21) के तहत राहत दी जा सकती है।
Q4: अजमल कसाब और हाफिज सईद का जिक्र कोर्ट में क्यों हुआ?
Ans: केंद्र सरकार के वकील ने यह समझाने के लिए इनका उदाहरण दिया कि आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों में ‘सिर्फ मुकदमे में देरी’ को जमानत का ग्राउंड नहीं बनाया जा सकता। सरकार का तर्क है कि अगर ऐसा हुआ, तो खूंखार आतंकी भी इस नियम का फायदा उठाकर जेल से बाहर आ सकते हैं।


