जयपुर : आत्म विकास में विनम्रता और वंदना के महत्व को रेखांकित करते हुए मुनिश्री तत्त्व रुचि ‘तरुण’ जी महाराज ने कहा कि चारित्र आत्मा को वंदना करने से दुर्भाग्य का अंत होता है और सौभाग्य का निर्माण होता है। उन्होंने कहा कि वंदना और नमस्कार व्यक्ति के भीतर विनम्रता का विकास करते हैं तथा अहंकार के विलय का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
अणुविभा केन्द्र, मालवीय नगर में शुक्रवार को ‘आत्म विकास में वंदना की भूमिका’ विषय पर विशेष आयोजन हुआ। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए मुनिश्री तत्त्व रुचि ‘तरुण’ जी ने कहा कि नमस्कार की परंपरा सभी धर्मों में मान्य रही है। जैन धर्म गुणों का उपासक है और इसी कारण नमस्कार महामंत्र में भी किसी व्यक्ति विशेष को नहीं, बल्कि गुणों को नमस्कार किया गया है।
मुनिश्री ने भगवान महावीर के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि चारित्र आत्मा की वंदना करने से व्यक्ति दुर्भाग्य को समाप्त कर सौभाग्य का अर्जन करता है। आगम शास्त्र के संदर्भ में उन्होंने बताया कि वंदना से नीच कुल में जन्म लेने वाले कर्मों का क्षय तथा उच्च कुल में जन्म लेने वाले कर्मों का अर्जन होता है। साथ ही व्यक्ति के प्रति समाज में अनुकूल भावनाओं का निर्माण होता है और उसके कथन को सहज स्वीकार्यता मिलने लगती है। इस प्रकार वंदना व्यक्ति के जीवन में सौभाग्य का निर्माण करती है।
संत श्री संभव कुमार जी महाराज ने कहा कि बड़ों को वंदन-नमस्कार करने वाला व्यक्ति बिना मांगे ही उनका आशीर्वाद प्राप्त कर लेता है। यही आशीर्वाद भविष्य में सफलता का आधार बनता है। उन्होंने कहा कि देव, गुरु और धर्म के प्रति की गई वंदना कभी व्यर्थ नहीं जाती। जैन दर्शन के अनुसार चारित्र आत्मा को वंदना करने से कर्मों का भार हल्का होता है और आत्मा में निर्मलता का विकास होता है।
कार्यक्रम में पुण्य तत्त्व का विश्लेषण किया गया। ‘भरत मुक्ति’ नामक गेय व्याख्यान के माध्यम से वनीता नगरी (अयोध्या) की विशेषताओं का वर्णन किया गया तथा राजा ऋषभ को युग का आदिकर्ता बताया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर अरनाथ प्रभु की स्तुति से हुआ।
इसी अवसर पर मौन एवं स्वाध्याय अठाई तप आराधना का शुभारंभ भी किया गया। मंगल मंत्रोच्चार के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
संदेश स्पष्ट था—वंदना केवल झुकना नहीं, बल्कि अहंकार से ऊपर उठकर आत्मा के गुणों को स्वीकार करने की साधना है।








