नई दिल्ली : विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने भारतीय पारंपरिक ज्ञान, प्राचीन पांडुलिपियों और चिकित्सा परंपराओं के संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि भारत की प्रगति के लिए तकनीक और परंपरा का साथ चलना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सभ्यताएं अपनी विशिष्ट पहचान को दूसरों से कटकर नहीं, बल्कि आत्मविश्वास के साथ संवाद और आदान-प्रदान के जरिए संरक्षित करती हैं।
जयशंकर सोमवार को नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (आईआईसी) में ‘निरामयता: दक्षिण एशियाई ग्रंथों और परंपराओं में उपचार एवं स्वास्थ्य’ प्रदर्शनी के उद्घाटन अवसर पर संबोधित कर रहे थे। इस प्रदर्शनी में दक्षिण एशिया की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों, स्वास्थ्य संबंधी मान्यताओं और प्राचीन ज्ञान परंपराओं को प्रदर्शित किया गया है।
विदेश मंत्री ने कहा कि संहिता इनिशिएटिव भारतीय उपमहाद्वीप की पांडुलिपि परंपराओं को संरक्षित करने, उनका दस्तावेजीकरण करने और उन्हें आम लोगों तथा शोधकर्ताओं के लिए सुलभ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण काम कर रहा है। ऐसे प्रयास न केवल भारत की बौद्धिक विरासत को सुरक्षित रखते हैं, बल्कि प्राचीन ज्ञान की गहराई और वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता को समझने का अवसर भी प्रदान करते हैं।
चिकित्सा से आगे, जीवन को समझने की परंपरा
जयशंकर ने कहा कि यह प्रदर्शनी केवल चिकित्सा पद्धतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच संबंधों को लेकर भारतीय सभ्यता की व्यापक समझ को सामने लाती है। प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपराओं में शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक शांति और प्राकृतिक परिवेश के साथ सामंजस्य को भी महत्व दिया गया।
उन्होंने बताया कि भारतीय उपमहाद्वीप में स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान का विकास लंबे समय तक अवलोकन, चिंतन और व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर हुआ। वैदिक मंत्रों, बौद्ध मठों की परंपराओं और शल्य चिकित्सा, औषध विज्ञान तथा उपचार से संबंधित ग्रंथों ने इस ज्ञान को समृद्ध बनाया। संहिताओं ने इस अनुभवजन्य ज्ञान को व्यवस्थित रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे इसे पढ़ने, सिखाने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने में मदद मिली।
आदान-प्रदान से समृद्ध हुआ भारतीय ज्ञान
विदेश मंत्री ने कहा कि भारत की चिकित्सा परंपराएं विभिन्न भाषाओं, भौगोलिक क्षेत्रों और संस्कृतियों के बीच संवाद से विकसित हुईं। तीर्थयात्राओं और व्यापारिक मार्गों के जरिए चिकित्सा संबंधी जानकारियों का प्रसार हुआ। संस्कृत के ग्रंथों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया गया और अलग-अलग क्षेत्रों के विद्वानों तथा चिकित्सकों ने नए उपचार, औषधीय पदार्थ और औषध निर्माण की पद्धतियां विकसित कीं।
उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए दुनिया से अलग-थलग रहना जरूरी नहीं है। आत्मविश्वास के साथ संवाद करने और दूसरे समाजों के अनुभवों से सीखने से सभ्यताएं अपनी विशिष्टता को और मजबूत कर सकती हैं।
जयशंकर ने प्राचीन ज्ञान को सुरक्षित रखने में वैद्यों, शल्य चिकित्सकों, हकीमों, बौद्ध भिक्षुओं और जड़ी-बूटियों के विशेषज्ञों के योगदान को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि इन लोगों ने ज्ञान को संरक्षित करने और अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पांडुलिपियों के संरक्षण में एआई की भूमिका
जयशंकर ने कहा कि पांडुलिपियां केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं हैं, बल्कि वे यह भी बताती हैं कि अतीत के समाज किस तरह सोचते थे, प्रयोग करते थे, संस्थाओं का संचालन करते थे और अपने ज्ञान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाते थे।
उन्होंने चेताया कि समय के साथ भाषाओं, लिपियों और व्याख्या की परंपराओं के कमजोर पड़ने से ज्ञान के महत्वपूर्ण स्रोत लुप्त होने का खतरा पैदा हो सकता है। ऐसे में पांडुलिपियों का संरक्षण करने के साथ उन्हें आधुनिक समाज के लिए उपयोगी और सुलभ बनाना भी जरूरी है।
विदेश मंत्री ने डिजिटलीकरण, व्यवस्थित सूचीकरण, विद्वानों के बीच सहयोग और सार्वजनिक प्रदर्शनियों को इस दिशा में महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की संभावनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका उपयोग पांडुलिपियों के संरक्षण, पुनर्स्थापन और उन तक लोगों की पहुंच बेहतर बनाने में किया जा सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी पहलों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक पहचान और व्यापक प्रसार दिलाने के उपाय तलाशे जाने चाहिए।
‘विकास भी, विरासत भी’ पर दिया जोर
जयशंकर ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर भी प्रदर्शनी के उद्घाटन की जानकारी साझा की। उन्होंने ‘निरामयता’ को व्यक्ति, समाज और प्राकृतिक संसार के बीच संबंधों की सभ्यतागत समझ को जानने का प्रयास बताया। साथ ही, उन्होंने पारंपरिक स्वास्थ्य ज्ञान को व्यवस्थित करने और उसे पीढ़ियों तक पहुंचाने में संहिताओं के महत्व को रेखांकित किया।
विदेश मंत्री ने कहा कि वर्तमान समय में, जब दुनिया गहरे आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक बदलावों से गुजर रही है, भारत की बौद्धिक विरासत का संरक्षण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने जोर दिया कि पांडुलिपियों को सुरक्षित रखना देश के बौद्धिक संसाधनों में निवेश करने जैसा है।
उन्होंने कहा कि भारत की प्रगति के लिए आधुनिक तकनीक और परंपरा को साथ लेकर चलना होगा। यही दृष्टिकोण ‘विकास भी, विरासत भी’ के विचार को सार्थक बनाता है।








