युवा पीढ़ी की समस्याएं सुनकर ही निकलेगा समाधान: जनरल नरवणे

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पुणे : भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे (सेवानिवृत्त) ने Gen Z यानी युवा पीढ़ी के विचारों को समझने और उनसे संवाद स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने ‘सत्ता परिवर्तन’ (Regime Change) को लेकर चल रही बहस के बीच कहा कि युवा पीढ़ी का सोचने का तरीका अलग हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे गलत हैं।

गुरुवार को समाचार एजेंसी ANI से बातचीत के दौरान जनरल नरवणे ने कहा कि समाज और अधिकारियों को युवा पीढ़ी के विचारों, शिकायतों और उनके सामने आने वाली कठिनाइयों को समझने का गंभीर प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने कहा, “युवा पीढ़ी के सोचने का तरीका अलग है। हालांकि, अलग तरीके से सोचने का मतलब यह नहीं है कि वे गलत हैं।”

पूर्व सेना प्रमुख ने आपसी संवाद और धैर्यपूर्वक एक-दूसरे की बात सुनने को समस्याओं के समाधान का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि युवाओं की परेशानियों और उनके मन में मौजूद भ्रम को समझे बिना उनका समाधान करना मुश्किल है। इसलिए एक-दूसरे के विचारों को सुनना और समझना बेहद जरूरी है।

‘सत्ता परिवर्तन’ को लेकर राजनीतिक बहस तेज

‘सत्ता परिवर्तन’ को लेकर विवाद उस समय तेज हो गया, जब वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे आंदोलन को ‘सत्ता परिवर्तन की लड़ाई’ बताया। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा ने भी इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान बांग्लादेश में Gen Z के नेतृत्व वाले आंदोलन का उल्लेख किया।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कांग्रेस और उसके सहयोगियों पर आरोप लगाया कि वे दिल्ली में युवाओं के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों का इस्तेमाल ‘अराजकता’ फैलाने और बांग्लादेश की तर्ज पर सरकार बदलने के प्रयास के लिए कर रहे हैं।

वहीं, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भी विपक्षी नेताओं और बाहरी तत्वों पर भारत में हिंसक सड़क प्रदर्शनों को बढ़ावा देने की कोशिश करने का आरोप लगाया। उन्होंने इन प्रयासों की तुलना बांग्लादेश और पेरिस में हुए प्रदर्शनों से की।

कांग्रेस ने बांग्लादेश और फ्रांस से तुलना को बताया अनुचित

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भारत में लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों की तुलना दूसरे देशों में हुई हिंसक घटनाओं से करने पर आपत्ति जताई। ANI से बातचीत में उन्होंने कहा कि भारत न तो बांग्लादेश है और न ही फ्रांस। उन्होंने जोर दिया कि भारत में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के माध्यम से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की मांग की जा रही है।

थरूर ने कहा कि यह संवैधानिक मुद्दा है, न कि किसी सरकार को सत्ता से हटाने का प्रयास।

कांग्रेस के राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने भी सत्तारूढ़ दल की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी निष्पक्षता और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर उठ रही चिंताओं को बदनाम करने के लिए एक ‘खतरनाक नैरेटिव’ का इस्तेमाल किया जा रहा है।

खेड़ा ने भारत और यूरोपीय देशों की तुलना को अनुचित बताते हुए आरोप लगाया कि इस तरह की बयानबाजी के जरिए अल्पसंख्यकों को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है।

मोहन भागवत ने भी दी प्रतिक्रिया

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने भी सत्ता परिवर्तन की अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि “सत्ता परिवर्तन न तो हुआ है और न ही होगा।”

फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश के घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए भागवत ने यह टिप्पणी ऐसे समय में की है, जब देश में विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक बदलाव को लेकर बहस जारी है।

इस पूरे विवाद के बीच पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे का बयान युवा पीढ़ी के विचारों को समझने, उनकी समस्याओं को सुनने और संवाद के माध्यम से समाधान खोजने के महत्व को रेखांकित करता है।