224वां आचार्य भिक्षु चरमोत्सव : महातपस्वी महाश्रमण की सन्निधि में आध्यात्मिक आयोजन

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लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के प्रवर्तक, आद्य अनुशास्ता आचार्यश्री भिक्षु का 224वां चरमोत्सव तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, आचार्यश्री भिक्षु के परंपर पट्टधर, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में गुरुवार को भव्य एवं आध्यात्मिक रूप में समायोजित हुआ। भाद्रव शुक्ला त्रयोदशी, गुरुवार को सुधर्मा सभा में आयोजित 224वें आचार्य भिक्षु चरमोत्सव कार्यक्रम के दौरान युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि आज भाद्रव शुक्ला त्रयोदशी है। चतुर्मास का प्रायः पूर्वाध सम्पन्न हो गया है। पर्युषण और भगवती संवत्सरी का आयोजन हो चुका है। आज का दिन परम पूज्य, महामना आचार्यश्री भिक्षु से जुड़ा हुआ है। आज के दिन उनके इस मानव जीवन का वह चरम दिन हुआ था। सबकी अपनी-अपनी कार्यशैली, सिद्धांत और प्रकृति में अंतर हो सकता है। वे किसी आचार्य के उत्तराधिकारी नहीं बने। वे किसी पूर्वाचार्यों द्वारा मनोनीत नहीं थे। जिस प्रकार तीर्थंकर को कोई पद नहीं प्रदान करता, उसी प्रकार आचार्यश्री भिक्षु को किसी ने अपना पद नहीं सौंपा था, वे स्वयं ही जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के प्रवर्तक व प्रथम अनुशास्ता बन गए। आचार्य में अपनी संपदाएं हों तो वह आचार्यत्व ज्यादा गरिमापूर्ण और शोभायमान हो सकता है।
आचार्यश्री भिक्षु जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य अनुशास्ता बने। कल्पना करें कि वे भावितात्मा अणगार जैसे साधु पुरुष थे। आचार्य भिक्षु एक तेजस्वी संत पुरुष थे। वे आदि आचार्य थे। आचार्यों में अष्टगणी संपदाएं होती हैं। हालांकि सारे आचार्यों में समान संपदाएं हों, यह कहना कठिन है, तारतम्य हो सकता है। आचार्यों की अपनी आचार की साधना होती है। आचार्यश्री भिक्षु के जीवन में आचार को भी देखा जा सकता है तो उनके जीवन में बुद्धिमत्ता का भी अच्छा योग था। बुद्धि अच्छी होती है तो अच्छा निर्णय लिया जा सकता है। संघ को प्रारम्भ हुए करीब पन्द्रह वर्ष ही हुए थे, उन्होंने धर्मसंघ के भावी उत्तराधिकारी के रूप में भारमलजी स्वामीजी को घोषित कर दिया। वे निर्भिक और साहसी थे। आचार्यश्री भिक्षु में विशेष बुद्धिमत्ता का दर्शन किया जा सकता है। कई बार अवरोध, विरोध की स्थिति के बाद भी मन पर कोई प्रभाव न पड़े, यह भी आचार्य की विशेषता होती है। एक ओर कार्य का भार हो, दूसरी ओर विरोध हो तो भी कोई चिंता, भय नहीं, समता, निर्भिकता, मनोबल का होना आवश्यक होता है। आचार्यश्री भिक्षु अपने विरोधों में आगे बढ़े। आचार्यश्री भिक्षु के 77 वर्ष आ गए थे और उन्होंने अपना वि.सं. 1859 का चतुर्मास पाली में किया। वहां से वे सिरियारी पधारे और वहां वि.सं. 1860 के चतुर्मास की घोषणा भी कर दी। उन्हें चतुर्मास के पक्की हाट प्राप्त हुए। सात ठाणे ने वहां चतुर्मास किया।
वे आठवें दशक में निरोग रहे। स्वामीजी की चाल तेज थी। वे सहारा भी नहीं लेते थे। श्रावण महीने की पूर्णिमा तक स्वयं गोचरी भी किया करते थे। अपने शिष्यों को आवश्यक सूत्र लिख-लिखकर समझाते थे। स्वामीजी वीरपुरुष थे। उन्हें अपना समय निकट दिखने के बाद भी निर्भीक रहे। भाद्रव शुक्ला एकादशी को उन्होंने स्पष्ट फरमाया कि अब मुझे आहार नहीं लेना है। उसके बाद उन्होंने द्वादशी को जल के सिवाय सभी का त्याग कर दिया। द्वादशी के दिन उन्होंने संथारे का प्रत्याख्यान भी हो गया। आज के दिन उनका महाप्रयाण हो गया। उनका महाप्रयाण अनशन की स्थिति में आया। परम पूजनीय, परम वंदनीय आचार्यश्री भिक्षु हमें गुरु के रूप में प्राप्त हुए। इस अवसर पर आचार्यश्री ने स्वरचित गीत का संगान किया।
मुनिवृंद ने आज के अवसर पर गीत का संगान किया। आचार्यश्री भिक्षु के संदर्भ में श्रीमज्जयाचार्यजी द्वारा रचित भिक्षु दृष्टांत पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद पुस्तक ‘द स्टोरीज ऑफ आचार्य भिक्षु’ जिसे मुनि ध्यानमूर्तिजी ने अनुवादित किया है। उस कृति को जैन विश्व भारती के पदाधिकारियों ने आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित की। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। चरमोत्सव के संदर्भ में मुनिवृंद ने गीत का संगान किया।
तदुपरान्त युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी ने इस अवसर पर महामना भिक्षु के प्रति अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति अर्पित की। साध्वीप्रमुखाजी ने तेरापंथ धर्मसंघ के प्रथम अनुशास्ता के जीवन वृत्तांतों का वर्णन करते हुए उनके प्रति अपनी विनयांजलि समर्पित की। साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने भी महामना आचार्यश्री भिक्षु के अपनी भावांजलि अर्पित की। तदुपरान्त आचार्यश्री पट्ट से नीचे उतरे और खड़े हुए तो चतुर्विध धर्मसंघ भी अपने स्थान पर खड़े होकर अपने आराध्य के साथ संघगान किया। इस संघगान के साथ ही आज का कार्यक्रम सुसम्पन्न हुआ।