लाडनूं : लाडनूं की धरा पर स्थित जैन विश्व भारती परिसर में योगक्षेम वर्ष का मंगल प्रवास कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘प्रज्वलित अग्नि को बुझाएं’ को व्याख्यायित करते हुए कहा कि जीव के भीतर तैजस शरीर भी होता है। यह मानव के साथ ही रहती है। दो शरीर ऐसे होते हैं, जिनका साहचर्य मुक्ति मिलने तक बना रहता है। वे हैं- तैजस शरीर और कार्मण शरीर। ये दो शरीर इतने पक्के साथी हैं जो मौत के बाद भी साथ नहीं छोड़ते, अगले जन्म में भी साथ निभाते हैं। घर-परिवार के लोग अगले जन्म में साथ नहीं जाते। ज्यादा से ज्यादा कोई श्मशान घाट तक चला जाए, लेकिन तैजस और कार्मण शरीर आत्मा के साथ अगले जन्म में भी साथ ही जाते हैं।
आदमी के शरीर में उष्णता की स्थिति भी बनती है। जो अपने आप में सुस्थिर होता है, वह स्वस्थ होता है। शरीर में अग्नि भी संतुलित रहनी चाहिए। अग्नि का स्वभाव उष्णता का है तो जल का स्वभाव शीतल है। इनका अपना-अपना स्वभाव होता है। आगम में कषाय को भी अग्नि कहा गया है। वह मानव के भीतर जलती रहती है। कषाय आश्रव तो आगे के भी कई गुणस्थानों तक चालू रहता है। कषाय की अग्नि गृहस्थों में क्या छठे-सातवें गुणस्थान में स्थित साधु में भी कषाय की अग्नि अखण्ड रूप से जलती ही रहती है। शुभ योग में बैठे हुए साधु में भी वह अग्नि प्रज्वलित ही रहती है। इस कारण कषाय को अग्नि कहा गया है। इस अग्नि को शांत करने के लिए श्रुत, शील और तप रूपी जल की आवश्यकता होती है। श्रुत, शील और तप के माध्यम से इस अग्नि को शांत किया जा सकता है।
आगम की वाणी स्वाध्याय करें, अनुप्रेक्षा करें तो कषाय रूपी अग्नि शांत रह सकती है। श्रुत एक प्रकार का पवित्र जल है। जहां तक संभव हो और जितना हो सके, आगम का अध्ययन करने का प्रयास किया जा सकता है। आगे चतुर्मास भी है, इस समय का आगम स्वाध्याय में समय लगाने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपना व्यवहार शांतिपूर्ण रखने का प्रयास करना चाहिए। तपस्या के माध्यम से भी कषाय रूपी अग्नि को मंद करने का प्रयास करना चाहिए। श्रुत, शील और तप पवित्र जल हैं। इनके माध्यम से कषाय रूपी अग्नि को शांत करते रहने का प्रयास करना चाहिए। इनमें श्रुत का जितना विकास होगा, आगम की बातें जीवन में आएंगी तो कषाय रूपी अग्नि मंद रहेगी। आगमाधारित व्यवहार प्रशिक्षण प्राप्त होता रहे।








