जयपुर : तेरापंथ स्थापना दिवस और गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर पर बुधवार को अणुविभा केन्द्र, मालवीय नगर में आध्यात्मिक चेतना और गुरु महिमा का अद्भुत संगम देखने को मिला। मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ एवं मुनिश्री संभव कुमार जी के सान्निध्य में श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ का 267वां स्थापना दिवस श्रद्धा, भक्ति और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।
अणुविभा केन्द्र के महाप्रज्ञ सभागार में आयोजित विशेष धार्मिक सभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि तेरापंथ की स्थापना धार्मिक जगत में एक नई दृष्टि और नई सृष्टि के सूत्रपात का दिन है। आचार्य संत भीखण जी ने धर्म के क्षेत्र में एक ऐसी क्रान्ति का सूत्रपात किया, जिसने धार्मिक जीवन को नई दिशा और नया आलोक प्रदान किया।
उन्होंने कहा कि दान-दया, पुण्य-पाप, हिंसा-अहिंसा, धर्म-अधर्म तथा लौकिक-लोकोत्तर जैसे गूढ़ विषयों की जिनवाणी के आधार पर की गई व्याख्या अत्यंत अद्भुत और विलक्षण थी। साधु संस्था में आए आचार-शैथिल्य को दूर करने और मर्यादित जीवन-पद्धति को स्थापित करने के लिए आचार्य संत भीखण जी द्वारा उठाए गए कदमों ने एक ऐसे संगठन की नींव रखी, जो आज भी अपनी विशिष्ट पहचान के साथ आध्यात्मिक यात्रा पर अग्रसर है।
गुरुपूर्णिमा के अवसर पर गुरु की महत्ता को रेखांकित करते हुए मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा, “दुनिया में गुरु बिन घोर अंधेर है। जिसके जीवन में गुरु नहीं, उसका जीवन शुरू नहीं। वास्तव में गुरु वह शक्ति है, जो अज्ञान का नाश करती है और ज्ञान का प्रकाश करती है।” उन्होंने कहा कि गुरु केवल मार्गदर्शन देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि वह चेतना है जो मनुष्य को स्वयं से परिचित कराकर उसके भीतर ज्ञान और विवेक का प्रकाश जगाती है।
तेरापंथी सभा के तत्त्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में मुनिश्री संभव कुमार जी महाराज ने कहा कि तेरापंथ स्थापना विशुद्ध अध्यात्म मार्ग की स्थापना का अवसर है। आचार्य संत भीखण जी अट्ठारहवीं सदी के अंत में इस धरा पर आए और उन्नीसवीं सदी के दूसरे दशक में उन्होंने धर्म के क्षेत्र में एक ऐसी क्रान्ति का सूत्रपात किया, जिसने आगे चलकर ‘तेरापंथ’ के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
उन्होंने कहा कि 267 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भी तेरापंथ एक अखंड और विशिष्ट संगठन के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है। इसके पीछे संगठन के संस्थापक आचार्य संत भीखण जी की दूरदर्शी सोच और उनके द्वारा स्थापित मर्यादाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। संगठन की एकता, अनुशासन और अखंडता के लिए निर्धारित ये मर्यादाएं आज भी न केवल तेरापंथ के अनुयायियों के लिए मार्गदर्शक हैं, बल्कि अन्य धार्मिक संगठनों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रही हैं।
कार्यक्रम का शुभारंभ गुरु की महिमा का गुणगान करने वाले मंगल गीत के संगान से हुआ। इस अवसर पर तेरापंथ सभा के अध्यक्ष श्री शांतिलाल जी गोलछा एवं तेरापंथ महिला मंडल (शहर) की अध्यक्षा श्रीमती कौशल्या जी जैन ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
तेरापंथ स्थापना दिवस और गुरुपूर्णिमा का यह आयोजन श्रद्धा, साधना और गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति समर्पण का संदेश देते हुए सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं ने गुरु के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हुए आध्यात्मिक जीवन में ज्ञान, अनुशासन और मर्यादा के महत्व को आत्मसात करने का संकल्प लिया।








