मुंबई : बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के दो पदाधिकारियों के खिलाफ मुंबई पुलिस की तड़ीपारी की कार्रवाई को रद्द करते हुए इसे पूरी तरह अवैध और कठोर बताया। सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस से सवाल किया कि जब प्रदर्शन में कांग्रेस, शिवसेना-यूबीटी और एनसीपी समेत अन्य राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता भी शामिल थे, तो कार्रवाई केवल एक विशेष धर्म से जुड़े लोगों के खिलाफ ही क्यों की गई।
जस्टिस माधव जे. जामदार की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि एफआईआर में केवल नारेबाजी का उल्लेख है। इसमें किसी व्यक्ति या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की बात नहीं कही गई है। अदालत ने कहा कि केवल बिना अनुमति प्रदर्शन करने के आधार पर किसी व्यक्ति को तड़ीपार नहीं किया जा सकता और चुनिंदा तरीके से कार्रवाई भी उचित नहीं है।
‘क्या सिर्फ धर्म के कारण हुई कार्रवाई?’
अदालत ने पुलिस से पूछा कि क्या कांग्रेस या शिवसेना-यूबीटी के राजनीतिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ भी इसी तरह की कार्रवाई की गई थी। कोर्ट ने सवाल किया कि क्या याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई इसलिए की गई क्योंकि वे एक ही धर्म से संबंधित हैं।
पुलिस की ओर से पेश सरकारी वकील ने कार्रवाई का बचाव करते हुए याचिकाकर्ताओं के प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से कथित संबंधों का हवाला दिया। हालांकि, याचिकाकर्ताओं के वकील ने इस आरोप से इनकार किया। अदालत ने इस पर कहा कि पुलिस के कारण बताओ नोटिस में कथित PFI संबंध का उल्लेख नहीं किया गया था।
बाबरी मस्जिद पर राय रखना राष्ट्रविरोधी कैसे?
तड़ीपारी के आदेश के समर्थन में पुलिस ने बाबरी मस्जिद सहित विभिन्न मुद्दों पर हुए प्रदर्शनों से जुड़ी एफआईआर का भी हवाला दिया था। इस पर अदालत ने सवाल किया कि यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि बाबरी मस्जिद को ध्वस्त नहीं किया जाना चाहिए था, तो इस विचार को राष्ट्रविरोधी कैसे माना जा सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रत्येक नागरिक को अपनी राय रखने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। अदालत ने तड़ीपारी की कार्रवाई को नागरिकों के मौलिक अधिकारों के विपरीत बताते हुए मुंबई पुलिस का आदेश रद्द कर दिया।








