जयपुर : अणुविभा केन्द्र, मालवीय नगर में शुक्रवार को ‘प्रमाद बनाम प्रायश्चित’ विषय पर आध्यात्मिक एवं प्रेरणादायी सेमिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में जयपुर के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं धर्मप्रेमीजन उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के सान्निध्य प्रदानकर्ता एवं मुख्य वक्ता मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि मनुष्य गलतियों का पुतला है। भूल होना छद्मस्थ मानव की प्रकृति है, लेकिन भूल को छिपाना या स्वीकार न करना विकृति है। उन्होंने कहा कि भूल को स्वीकार कर उसमें सुधार करना भारतीय संस्कृति की विशेषता है।
मुनिश्री ने कहा कि ठोकर चलने वाले को लगती है और गलती कार्य करने वाले से होती है। जिस प्रकार कपड़ा गंदा होने पर पानी और साबुन से उसकी सफाई की जाती है तथा कपड़ा फटने पर सुई-धागे से उसे ठीक किया जाता है, उसी प्रकार स्वीकृत नियमों के पालन में हुई भूल या दोष की शुद्धि के लिए प्रायश्चित का विधान है। उन्होंने कहा कि “दोष शुद्धि और पाप मुक्ति की प्रक्रिया का नाम ही प्रायश्चित है।”
इस अवसर पर मुनिश्री संभव कुमार जी ने कहा कि मन साफ हो तो पाप माफ हो जाता है। यदि मन में माया-कपट का भाव बना रहे तो व्यक्ति कितने ही पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठान क्यों न कर ले, वास्तविक आध्यात्मिक शुद्धि संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि सरल और निश्छल व्यक्ति बिना आडंबर के भी आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है, जबकि कपटपूर्ण आचरण करने वाला व्यक्ति धार्मिक क्रियाएं करते हुए भी सच्चा आराधक नहीं बन पाता। प्रायश्चित तभी सार्थक होता है, जब उसके पीछे निश्छल मन और सरल हृदय हो।
कार्यक्रम का शुभारंभ आदि तीर्थंकर भगवान ऋषभनाथ जी के स्तुति गान से हुआ। इसके पश्चात प्रेक्षाध्यान एवं जप-अनुष्ठान के आध्यात्मिक प्रयोग करवाए गए। कार्यक्रम के अंत में तप प्रत्याख्यान एवं मंगल पाठ का संगान हुआ और इसी के साथ सेमिनार का समापन किया गया।








