लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगलवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के दौरान आज के निर्धारित विषय ‘अल्पोपधित्व’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि साधु के लिए पांच महाव्रत, पांच समितियां और तीन गुप्तियां- ये तेरह नियम आराधनीय होते हैं। पांच समितियों में चौथी समिति-आदान निक्षेप समिति। साधु के पास दो प्रकार के उपकरण हो सकते हैं। स्वयं की निश्रित चीजें रजोहरण, चोल-पट्टा आदि और कुण्डा, बाल्टी आदि प्रातिहार्य चीजें होती हैं। ये सारी वस्तुएं साधु के दिनचर्या में काम आने वाली होती हैं, लेकिन यहां कहा गया है कि साधु को अल्पोपधि बनने का प्रयास करना चाहिए। साधु को बहुत ज्यादा उपकरण का प्रयोग करने अथवा रखने से बचने का प्रयास करना चाहिए।
जितनी अल्प चीजें रहेंगी तो समय की बचत होगी। इसलिए साधु को अल्पोपधि बनने का प्रयास करना चाहिए। अनावश्यक संग्रह नहीं होता तो साधु हल्का भी रह सकता है और वह अपने समय को भी बचा सकता है।
अभी चतुर्मास लगने वाला है। साधु को यह ध्यान देना चाहिए कि उसके पास विधि अनुसार ही वस्त्र हैं ना? कहीं विधि से ज्यादा कपड़े तो नहीं हैं ना? साधु के पास वस्त्र, पात्र आदि भी सीमा से ज्यादा नहीं होना चाहिए। चतुर्मास के दौरान आचार्य के समक्ष इस बात की जानकारी भी देनी होती है। साधु के पास ज्यादा उपधियां न रहे। साधु को तो मानों हवा के समान हल्का होना चाहिए। पेन्सिल, डायरी, पुस्तक आदि जो भी उपयोग के लिए तो साथ में हो, लेकिन उनके प्रति अनावश्यक आकर्षण न रहे तथा उनका अनावश्यक संग्रह भी न हो।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि यह चतुर्दशी चतुर्मास लगनेे वाली चतुर्दशी है। चतुर्मास लगने वाला है। चतुर्मास लगने के बाद विहार-यात्रा बन्द हो जाती है और चार महीने तक एक ही क्षेत्र में रहना होता है। शेष आठ महीने विहार-यात्राएं आदि होती हैं। एक स्थान पर रहने से ज्ञानार्जन का अच्छा अवसर मिल जाता है, लोगों को अधिक से अधिक दर्शन-सेवा का लाभ मिल सकता है। संघ का आना, किसी शिविर, किसी कार्यशाला के आयोजन आदि का अवसर भी मिल सकता है। विहार के दौरान ऐसे शिविर, कार्यशाला आदि के लिए उचित स्थान आदि मिले न मिले। यह सारी व्यवस्थाएं चतुर्मास के दौरान हो सकती हैं। चतुर्मास के लम्बी तपस्या भी की जा सकती है। आज चातुर्मासिक पक्खी भी है। बीस लोगस्स का ध्यान करना सायं प्रतिक्रमण अपेक्षित होता है। आषाढ़ी पूर्णिमा के लिए चतुर्मास की स्थापना, परम पूज्य आचार्यश्री भिक्षु की नव्य-भव्य दीक्षा का दिवस और वहीं तेरापंथ स्थापना दिवस है। आषाढ़ी पूर्णिमा को रात्रि में धम्म जागरणा का कार्यक्रम भी है।
चतुर्मास में ज्ञानाराधना, चारित्राराधना, दर्शनाराधना की जा सकती है। कोई दीक्षा ले, कोई गुरुधारणा आदि करे तो यह सारे कार्य चल सकते है। इस दौरान जितना धर्मोद्योत होता रहे, ऐसा प्रयास किया जा सकता है। आचार्यश्री ने चतुर्दशी के संदर्भ में हाजरी का वाचन किया। तदुपरान्त उपस्थित चारित्रात्माओं ने अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र का उच्चारण किया। तत्पश्चात आचार्यश्री चतुर्मास लगने के संदर्भ में संक्षिप्त पाठ भी उच्चरित किया तो उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ ने उस पाठ को अपने आराध्य के साथ दोहराया। इस दौरान आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के भी उत्तर प्रदान किए।
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने दोपहर में फरीदाबाद से बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं की पुरजोर प्रार्थना को स्वीकार करते हुए वर्ष 2028 का मर्यादा महोत्सव बृहत्तर दिल्ली के अन्तर्गत फरीदाबाद में करने की घोषणा की। आचार्यश्री की इस अनुग्रहवृष्टि में अभिस्नात फरीदाबादवासी बुलंद जयघोष करते हुए अपने आराध्य के प्रति कृतज्ञता अर्पित की।








