डेस्क : अमेरिका में नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले मेल-इन वोटिंग को लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद तेज हो गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने गुरुवार को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए निचली अदालत के उस आदेश को हटाने की मांग की है, जिसने मेल-इन बैलेट के इस्तेमाल पर लगाई गई नई पाबंदियों को फिलहाल रोक दिया है।
ट्रंप प्रशासन की यह आपात अपील ऐसे समय में दाखिल की गई है, जब नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव में करीब दो महीने का समय बचा है और कई राज्यों में मतदाताओं को डाक के जरिए बैलेट भेजने की प्रक्रिया जल्द शुरू होने वाली है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला चुनाव अधिकारियों और मतदाताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मार्च में ट्रंप ने जारी किया था कार्यकारी आदेश
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मार्च 2026 में एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके जरिए प्रशासन ने मेल-इन वोटिंग की व्यवस्था पर नए प्रतिबंध लगाने की कोशिश की। ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि चुनाव प्रक्रिया में अधिक कड़े नियम लागू करने से मतदान की सुरक्षा मजबूत की जा सकती है और चुनाव संबंधी अनियमितताओं को रोकने में मदद मिलेगी।
हालांकि, आदेश सामने आने के बाद कई राज्यों, मतदान अधिकार संगठनों और अन्य समूहों ने अदालतों का रुख किया। उनका कहना है कि चुनाव कराने और मतदान की प्रक्रिया तय करने का अधिकार मुख्य रूप से राज्यों के पास है और संघीय सरकार इस व्यवस्था में इस तरह व्यापक हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
निचली अदालत ने लगाई रोक
ट्रंप प्रशासन के आदेश के आधार पर तैयार किए गए नए नियमों को लेकर संघीय अदालत में चुनौती दी गई। मैसाचुसेट्स की एक संघीय अदालत ने मेल-इन वोटिंग से संबंधित प्रशासन की नई व्यवस्था पर रोक लगा दी।
इसके बाद ट्रंप प्रशासन ने इस रोक को हटाने के लिए सीधे अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में आपात आवेदन दायर किया है। सरकार चाहती है कि निचली अदालत का आदेश प्रभावी न रहे और प्रशासन को चुनाव से पहले अपने नए नियम लागू करने की अनुमति मिले।
डाक से भेजे जाने वाले बैलेट पर नए नियम
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत अमेरिकी डाक सेवा यानी यूएस पोस्टल सर्विस को राज्यों द्वारा भेजे जाने वाले चुनावी बैलेट के लिए कुछ नए मानकों का पालन करना होगा। इसमें मतदाता संबंधी जानकारी को संघीय ऑनलाइन प्रणाली के माध्यम से उपलब्ध कराने और बैलेट के लिफाफों तथा उनकी पहचान से जुड़े मानकों को एकरूप बनाने जैसे प्रावधान शामिल हैं।
प्रशासन का कहना है कि इस तरह की व्यवस्था से डाक के जरिए होने वाले मतदान की प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित और व्यवस्थित बनाया जा सकता है। वहीं, विरोध करने वाले पक्षों का तर्क है कि इतने महत्वपूर्ण बदलाव चुनाव के बेहद करीब लागू करने से मतदाताओं और चुनाव अधिकारियों के बीच भ्रम पैदा हो सकता है।
चुनाव नजदीक होने से बढ़ी चिंता
इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी वजह नवंबर के मध्यावधि चुनाव का बेहद करीब होना है। अमेरिका में मेल-इन वोटिंग का इस्तेमाल बड़ी संख्या में मतदाता करते हैं। कई मतदाता व्यक्तिगत रूप से मतदान केंद्र तक पहुंचने के बजाय डाक के जरिए अपना वोट भेजते हैं।
कुछ राज्यों में चुनावी बैलेट मतदाताओं को भेजने की प्रक्रिया जल्द शुरू होने वाली है। ऐसे में यदि सुप्रीम कोर्ट ट्रंप प्रशासन के पक्ष में फैसला देता है तो राज्यों को कम समय में नई व्यवस्था के अनुरूप अपनी चुनावी प्रक्रिया में बदलाव करना पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी नजरें
सुप्रीम कोर्ट पहले भी ट्रंप प्रशासन के चुनाव संबंधी कुछ कदमों पर अंतरिम स्तर पर विचार कर चुका है। हालांकि, मेल-इन वोटिंग पर लगाए गए नए प्रतिबंधों की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला अभी बाकी है।
इस मामले में अदालत का फैसला केवल आगामी मध्यावधि चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा। यह यह भी तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है कि संघीय सरकार चुनाव प्रक्रिया और राज्यों द्वारा संचालित मतदान व्यवस्था में किस सीमा तक हस्तक्षेप कर सकती है।
चुनावी अधिकार बनाम चुनाव सुरक्षा की बहस
मेल-इन वोटिंग पर चल रही कानूनी लड़ाई ने अमेरिका में चुनावी अधिकार और चुनाव सुरक्षा के बीच बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है। ट्रंप प्रशासन नए नियमों को चुनाव प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में जरूरी कदम बता रहा है, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे मतदाताओं के लिए मतदान की प्रक्रिया कठिन हो सकती है।
अब सभी की निगाहें अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट पर हैं। अदालत का फैसला यह तय करेगा कि ट्रंप प्रशासन के मेल-इन बैलेट संबंधी नए प्रतिबंध नवंबर के मध्यावधि चुनाव में लागू हो पाएंगे या निचली अदालत की रोक फिलहाल बरकरार रहेगी।








