डेस्क : कर्नाटक हाईकोर्ट ने बच्चे से मिलने के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बदल दिया, जिसमें पिता को अपने चार वर्षीय बच्चे से हर मुलाकात के लिए 5,000 रुपये शुल्क देने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे से मिलने के लिए पिता से इस तरह का कोई शुल्क नहीं लिया जा सकता।
न्यायमूर्ति पी. श्री सुधा ने पति की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट ने बच्चे से मिलने के लिए महीने के निर्धारित दिनों में मुलाकात की व्यवस्था की थी और इसके लिए पिता पर शुल्क लगाना उचित नहीं है। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि बच्चे की मां ने स्वयं घर के बजाय अदालत के मुलाकात कक्ष में पिता से बच्चे की मुलाकात कराने पर सहमति जताई थी।
मां पर बच्चे को समय पर नहीं लाने का आरोप
मामले में दंपती के बीच तलाक की कार्यवाही लंबित है। फिलहाल बच्चे की अस्थायी अभिरक्षा मां के पास है। पिता ने आरोप लगाया कि मां बच्चे को उनसे मिलाने के लिए समय पर नहीं लाती और उसे पिता से स्वतंत्र रूप से बातचीत भी नहीं करने देती। पिता ने बच्चे की स्थायी अभिरक्षा के लिए भी बेंगलुरु फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की है।
हाईकोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के घर के बीच केवल करीब 1.75 किलोमीटर की दूरी है, इसके बावजूद बच्चे को पिता से मिलाने में देरी की जा रही है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि मां का रवैया इसी तरह जारी रहा तो इसका असर बच्चे की अंतिम अभिरक्षा के फैसले पर पड़ सकता है और बच्चे की अभिरक्षा पिता को सौंपने पर भी विचार किया जा सकता है।
बच्चे के हित को प्राथमिकता
महिला ने अदालत में कहा कि पिता से मिलने के दौरान बच्चा रोता है और पिता बच्चे के खर्च का भुगतान भी नहीं कर रहे हैं। इसके बाद फैमिली कोर्ट ने मुलाकात का समय निर्धारित करते हुए अदालत के मुलाकात कक्ष में बच्चे और पिता की मुलाकात कराने का निर्देश दिया था।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि मुलाकात के दौरान बच्चे के दादा-दादी मौजूद नहीं रहेंगे, ताकि पिता और बच्चे को मिलने के लिए उपलब्ध समय में एक-दूसरे के साथ पर्याप्त समय मिल सके।
अदालत के इस फैसले से साफ है कि बच्चे और पिता के बीच मुलाकात के अधिकार को केवल आर्थिक शर्त से नहीं जोड़ा जा सकता। मामले में अंतिम अभिरक्षा का फैसला तलाक की कार्यवाही और बच्चे के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा।








