आजकल माता-पिता की एक आम शिकायत है कि बच्चे किताबें नहीं पढ़ते, पढ़ाई में मन नहीं लगाते और अपना अधिकतर समय मोबाइल पर बिताते हैं। उन्हें बार-बार पढ़ने के लिए कहना पड़ता है। किताब लेकर बैठने को कहा जाए, तो बच्चे कुछ ही देर में ऊब जाते हैं; लेकिन मोबाइल हाथ में आते ही घंटों बीत जाते हैं और उन्हें समय का पता तक नहीं चलता।
लेकिन इस समस्या को समझने के लिए हमें एक सवाल खुद से भी पूछना चाहिए—क्या हमने कभी अपने बच्चों के सामने किताब पढ़ने का उदाहरण प्रस्तुत किया है?
जिस घर में माता-पिता के हाथों में हर समय मोबाइल रहता है, जहां सुबह की शुरुआत स्क्रीन देखकर होती है और रात का आखिरी समय भी मोबाइल के साथ बीतता है, वहां बच्चे से यह अपेक्षा करना कि वह स्वयं किताब उठाकर बैठ जाए, कितना व्यावहारिक है?
बच्चे वही सीखते हैं, जो देखते हैं
बचपन केवल सीखने की उम्र नहीं, बल्कि देखकर सीखने की उम्र भी है। बच्चे अपने माता-पिता को अपना पहला शिक्षक मानते हैं। वे यह नहीं देखते कि माता-पिता उन्हें क्या समझा रहे हैं, बल्कि यह भी देखते हैं कि माता-पिता स्वयं क्या करते हैं।
यदि माता-पिता बच्चे से कहते हैं कि मोबाइल कम चलाओ, लेकिन खुद हर थोड़ी देर में फोन देखने लगते हैं, तो बच्चे के लिए शब्दों से अधिक महत्त्व व्यवहार का होता है। यदि घर में खाली समय का अर्थ मोबाइल चलाना है, तो बच्चा भी धीरे-धीरे यही मानने लगता है कि मनोरंजन का सबसे आसान साधन स्क्रीन ही है।
फिर जब वही बच्चा किताब पढ़ने में रुचि नहीं दिखाता, तो सारा दोष उसकी एकाग्रता या उसकी पीढ़ी पर डाल देना उचित नहीं होगा। हमें यह भी देखना होगा कि हमने उसके सामने कैसी आदतों का संसार रखा है।
किताब और मोबाइल के बीच बदलती दुनिया
मोबाइल पर मिलने वाली रंगीन तस्वीरें, छोटे वीडियो, खेल और लगातार बदलती सामग्री बच्चों का ध्यान आसानी से खींचती है। इसके मुकाबले किताब पढ़ने में धैर्य, कल्पना और एकाग्रता की आवश्यकता होती है। पढ़ने की आदत विकसित होने में समय लगता है, जबकि मोबाइल पर मनोरंजन तुरंत मिल जाता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि मोबाइल पूरी तरह गलत है या तकनीक से बच्चों को दूर रखा जाना चाहिए। मोबाइल ज्ञान, शिक्षा और रचनात्मकता का माध्यम भी बन सकता है। समस्या तब पैदा होती है, जब उसका उपयोग जरूरत से अधिक होने लगता है और वह किताबों, खेलकूद, बातचीत तथा परिवार के साथ बिताए जाने वाले समय की जगह लेने लगता है।
बच्चे को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि किताब पढ़ना अच्छी आदत है। उसे किताबों से जुड़ने का अवसर भी देना होगा। उसे ऐसी कहानियां, रोचक प्रसंग और विषय उपलब्ध कराने होंगे, जो उसकी उम्र, रुचि और जिज्ञासा के अनुकूल हों।
क्या घर में किताबों के लिए जगह बची है?
एक समय था, जब घरों में अखबार पढ़ना, पत्रिकाएं पलटना, कहानी की किताबें पढ़ना और परिवार के बीच किसी घटना पर चर्चा करना सामान्य बात थी। आज भी अनेक परिवारों में ये आदतें मौजूद हैं, लेकिन कई घरों में खाली समय का बड़ा हिस्सा स्क्रीन ने ले लिया है।
हमें विचार करना होगा कि क्या घर में किताबों के लिए कोई छोटी-सी जगह है? क्या बच्चे ने अपने माता-पिता को कभी उत्सुकता से कोई पुस्तक पढ़ते देखा है? क्या घर में किसी कहानी पर बातचीत होती है? क्या बच्चे को पुस्तकालय ले जाया जाता है या जन्मदिन पर कभी उसकी पसंद की किताब उपहार में दी जाती है?
पढ़ने की आदत किसी आदेश से पैदा नहीं होती। वह वातावरण से विकसित होती है। जिस घर में किताबें सहज रूप से जीवन का हिस्सा होती हैं, वहां बच्चे के लिए भी किताबों से जुड़ना आसान हो सकता है।
बदलाव की शुरुआत माता-पिता से हो
बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए कुछ छोटे कदम बड़ा अंतर पैदा कर सकते हैं।
सबसे पहले, माता-पिता प्रतिदिन कुछ समय स्वयं किताब पढ़ें। यह जरूरी नहीं कि वे घंटों पढ़ें। शुरुआत केवल 15 से 20 मिनट से की जा सकती है। इस दौरान परिवार के सभी सदस्य मोबाइल अलग रखकर अपनी-अपनी पसंद की किताब पढ़ें।
दूसरा, बच्चों पर उनकी रुचि के विरुद्ध किताबें न थोपें। किसी बच्चे को कहानियां पसंद हो सकती हैं, किसी को विज्ञान, इतिहास, चित्रकथाएं या खेल से जुड़ी पुस्तकें। पढ़ने का आनंद उसकी पसंद का सम्मान करने से भी पैदा होता है।
तीसरा, पढ़ने को सजा या अतिरिक्त पढ़ाई की तरह प्रस्तुत न करें। किताब को आनंद, कल्पना और नए संसार से परिचित होने का माध्यम बनाएं। कहानी पढ़ने के बाद बच्चे से उसके विचार पूछें, उसके साथ कहानी के पात्रों पर चर्चा करें और कभी-कभी उसे अपनी कहानी बनाने के लिए भी प्रेरित करें।
चौथा, घर में कुछ समय मोबाइल-मुक्त रखें। भोजन के समय, सोने से पहले और परिवार के साथ बातचीत करते समय फोन को दूर रखने की आदत पूरे परिवार के लिए उपयोगी हो सकती है। बच्चों के लिए स्क्रीन के स्पष्ट और उम्र के अनुकूल नियम बनाएं, लेकिन उन नियमों का पालन माता-पिता भी करें।
सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे की तुलना दूसरे बच्चों से न करें। हर बच्चे की रुचि और सीखने की गति अलग होती है। उद्देश्य उसे पढ़ने के लिए मजबूर करना नहीं, बल्कि धीरे-धीरे पढ़ने का आनंद समझाना होना चाहिए।
बच्चों को उपदेश नहीं, उदाहरण चाहिए
हम अक्सर कहते हैं कि आज की पीढ़ी किताबों से दूर होती जा रही है। लेकिन किसी भी पीढ़ी की आदतों को केवल उसकी पसंद से नहीं समझा जा सकता। परिवार, परिवेश और उपलब्ध विकल्प भी उसकी आदतों को आकार देते हैं।
यदि हम चाहते हैं कि बच्चे किताबों से दोस्ती करें, तो हमें अपने घरों में किताबों के लिए जगह बनानी होगी। यदि हम चाहते हैं कि वे धैर्यपूर्वक पढ़ना सीखें, तो हमें स्वयं भी कुछ समय स्क्रीन से दूर रहना होगा। और यदि हम चाहते हैं कि वे ज्ञान को महत्त्व दें, तो हमें अपने व्यवहार में ज्ञान के प्रति सम्मान दिखाना होगा।
यह बदलाव किसी बड़े अभियान से नहीं, बल्कि घर के छोटे-छोटे निर्णयों से शुरू हो सकता है। एक किताब, प्रतिदिन के कुछ मिनट और माता-पिता का अपना उदाहरण—शुरुआत के लिए इतना भी पर्याप्त हो सकता है।
अंततः सवाल यह नहीं है कि बच्चे किताबें क्यों नहीं पढ़ रहे हैं। सवाल यह भी है कि हम उन्हें किताबें पढ़ते हुए देखने का अवसर कितनी बार देते हैं।
क्योंकि बच्चे केवल हमारा भविष्य नहीं हैं; वे हमारे वर्तमान व्यवहार का प्रतिबिंब भी हैं। हम उन्हें जो जीवन जीकर दिखाते हैं, वे अक्सर उसी जीवन को अपना सामान्य व्यवहार मान लेते हैं।
इसलिए अगली बार जब हम बच्चे से कहें, “मोबाइल छोड़ो और किताब पढ़ो,” तो एक बार स्वयं भी मोबाइल रखकर किताब उठा लें।
हो सकता है, हमारी यही छोटी-सी पहल बच्चे के भीतर पढ़ने की एक ऐसी आदत जगा दे, जो जीवनभर उसका साथ निभाए।









