बच्चों से सेक्सुअलिटी पर बात करने में झिझकें नहीं माता-पिता: दीया मिर्जा

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मुंबई : अभिनेत्री दीया मिर्जा ने बच्चों की परवरिश को लेकर अपने विचार साझा करते हुए कहा है कि माता-पिता को बच्चों को बचपन से ही सम्मान, समानता, सहमति और व्यक्तिगत सीमाओं की समझ देनी चाहिए। खासतौर पर बेटों की परवरिश में इन मूल्यों को शामिल करना बेहद जरूरी है।

दीया ने कहा कि बच्चे अपने घर के माहौल और बड़ों के व्यवहार से बहुत कुछ सीखते हैं। वे देखते हैं कि परिवार में पुरुष महिलाओं के साथ किस तरह व्यवहार करते हैं, घरेलू और बच्चों से जुड़ी जिम्मेदारियां किस तरह साझा की जाती हैं और महिलाओं की सीमाओं का कितना सम्मान किया जाता है। इसलिए बच्चों को केवल बातें समझाने के बजाय माता-पिता को अपने व्यवहार से भी उदाहरण पेश करना चाहिए।

सहमति की सही समझ जरूरी

दीया के मुताबिक, बच्चों को सहमति का वास्तविक अर्थ समझाना जरूरी है। सहमति केवल किसी व्यक्ति की ओर से ‘ना’ न कहने का नाम नहीं है, बल्कि सामने वाले की सहज और स्वैच्छिक ‘हां’ भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि बच्चों को यह समझना चाहिए कि किसी व्यक्ति को दूसरे के ध्यान, स्नेह या नजदीकी पर अधिकार नहीं होता और अस्वीकृति को अपमान या चुनौती नहीं माना जाना चाहिए।

उम्र के अनुसार हो संवेदनशील बातचीत

अभिनेत्री ने कहा कि माता-पिता को बच्चों के साथ उम्र के अनुसार शरीर और सेक्सुअलिटी जैसे विषयों पर खुलकर बातचीत करनी चाहिए। बच्चों को उनके शरीर और निजी अंगों के बारे में सही जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि वे इन विषयों को शर्म या डर से न जोड़ें।

उन्होंने यह भी कहा कि बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, माता-पिता को रिश्तों, आकर्षण, सेक्स और पोर्नोग्राफी में दिखाई जाने वाली अवास्तविक या अस्वस्थ छवियों जैसे विषयों पर भी उचित तरीके से बातचीत करनी चाहिए। इससे बच्चों को स्वस्थ रिश्तों और व्यक्तिगत सीमाओं को समझने में मदद मिल सकती है।

गलत व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाना भी सिखाएं

दीया ने कहा कि बेटों को महिलाओं का सम्मान करने के साथ-साथ उनके प्रति होने वाले गलत व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाना भी सिखाया जाना चाहिए। स्कूल, दोस्तों के समूह, सोशल मीडिया या ऑनलाइन बातचीत में यदि किसी महिला के साथ अपमानजनक व्यवहार हो रहा है, तो बच्चों को उसे सामान्य मानकर चुप नहीं रहना चाहिए।

दीया के अनुसार, समानता और सम्मान की शिक्षा किसी एक उम्र या एक बातचीत तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इसकी शुरुआत परिवार से हो और बच्चों के बड़े होने के साथ संवाद भी उसी तरह आगे बढ़ता रहे।