‘भारत किसी का धर्मांतरण नहीं करता’, मोहन भागवत ने बताई देश की ज्ञान परंपरा

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डेस्क : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि भारत की परंपरा दूसरे देशों पर कब्जा करने या लोगों का धर्मांतरण कराने की नहीं रही है। उन्होंने कहा कि भारत ने अपनी ज्ञान परंपरा के माध्यम से दुनिया को सुख और शांति का मार्ग दिखाया है।

अखिल भारतीय विहार सेवा समूह के 14वें सम्मेलन को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि आज दुनिया विकास और पर्यावरण संरक्षण, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारिवारिक जीवन तथा धार्मिक आस्था और संघर्ष जैसी कई चुनौतियों के बीच संतुलन तलाश रही है। उनके मुताबिक, इन विरोधाभासों का समाधान किसी एक पक्ष को चुनकर नहीं किया जा सकता।

‘भारत के पास ज्ञान की बड़ी परंपरा’

भागवत ने कहा कि भारत के पास वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, गीता, जैन आगम, त्रिपिटक, गुरु ग्रंथ साहिब और संतों की शिक्षाओं से जुड़ी विशाल ज्ञान परंपरा है। उन्होंने कहा कि दुनिया को आज इस ज्ञान की जरूरत है और भारत से ही आगे का रास्ता निकलने की उम्मीद है।

उन्होंने कहा कि भारत ने हजारों वर्षों से किसी देश पर विजय प्राप्त किए बिना और किसी का धर्मांतरण किए बिना अपने विचार और ज्ञान को दुनिया के सामने रखा है।

‘राष्ट्र और धर्म एक-दूसरे से जुड़े’

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत में राष्ट्र और धर्म को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उनके अनुसार, राष्ट्र कमजोर होने पर धर्म पर भी संकट आता है और धर्म का पालन कमजोर होने से राष्ट्र भी प्रभावित होता है।

भागवत ने कहा कि भारतीय दृष्टिकोण केवल किसी एक वर्ग के कल्याण तक सीमित नहीं है। उन्होंने ‘सभी सुखी रहें’ की भारतीय भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि समाज का कोई वर्ग लगातार पीड़ित रहता है तो व्यापक कल्याण की अवधारणा भी अधूरी रह जाती है।

धार्मिक आस्था और सह-अस्तित्व पर जोर

भागवत ने धार्मिक आस्था और कट्टरता के बीच अंतर का उल्लेख करते हुए कहा कि आस्था के बढ़ने के साथ यदि कट्टरता बढ़ती है तो इससे समाज में संघर्ष पैदा हो सकता है। उन्होंने ऐसे संतुलन की आवश्यकता बताई जिसमें अलग-अलग मान्यताओं के बीच सम्मान और सह-अस्तित्व बना रहे।

उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा में अपनी आस्था पर कायम रहते हुए दूसरे लोगों की उपासना पद्धतियों का सम्मान करने की भावना रही है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि भारत का दृष्टिकोण धर्मांतरण के बजाय अपनी परंपरा और ज्ञान को साझा करने का रहा है।