सुख-शांति भौतिक साधनों से नहीं, आंतरिक साधना से मिलती है : मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’

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जयपुर :  मालवीय नगर स्थित अणुविभा केन्द्र में रविवार को नवरात्रि आध्यात्मिक अनुष्ठान का मंगल शुभारंभ हुआ। मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ एवं मुनिश्री संभव कुमार जी के सान्निध्य में आयोजित धर्मसभा में श्रद्धालुओं को आत्मशुद्धि, आंतरिक शांति और जीवन में समभाव के महत्व का संदेश दिया गया। इस अवसर पर मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने ‘सुखी कौन?’ विषय पर प्रवचन करते हुए कहा कि वास्तविक सुख भौतिक साधनों की प्रचुरता में नहीं, बल्कि मन की शांति और आंतरिक साधना में निहित है।

मुनिश्री ने कहा कि नवरात्रि केवल बाहरी पूजा-अर्चना का अवसर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर झांकने, आत्मशुद्धि करने और जीवन को सकारात्मक ऊर्जा से भरने का समय है। मनुष्य को इस पावन अवधि का उपयोग अपने विचारों, व्यवहार और जीवनशैली में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए करना चाहिए।

साधनों की प्रचुरता नहीं, मन की शांति है सुख का आधार

‘सुखी कौन?’ विषय पर अपने विचार रखते हुए मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि भाग्य से व्यक्ति को धन-दौलत और सुख-सुविधाओं के अनेक साधन प्राप्त हो सकते हैं, लेकिन वास्तविक सुख का अनुभव करना उसके अपने दृष्टिकोण और आंतरिक स्थिति पर निर्भर करता है। भौतिक संपन्नता जीवन को सुविधाजनक बना सकती है, लेकिन मन को शांति प्रदान नहीं कर सकती। स्थायी सुख वही है, जो भीतर से उत्पन्न होता है और विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति को विचलित नहीं होने देता।

उन्होंने कहा कि साधु-संतों के जीवन में सुख का आधार बाहरी वैभव नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और साधना है। मनुष्य जितना अपनी इच्छाओं, अपेक्षाओं और मानसिक अशांति पर नियंत्रण करना सीखता है, उतना ही वह संतोषपूर्ण जीवन की ओर बढ़ता है। जीवन में सुखी होने के लिए साधनों के पीछे भागने के बजाय साधना, आत्मचिंतन और संयम को महत्व देना आवश्यक है।

परिवार से शुरू हो प्रेम और आत्मीयता की पहल

पारिवारिक संबंधों में बढ़ती दूरियों और मानवीय मूल्यों में आ रही गिरावट पर चिंता व्यक्त करते हुए मुनिश्री ने कहा, “प्रेम दुनिया में सबसे करो, किंतु उसकी शुरुआत हमेशा अपने घर से करो।” उन्होंने कहा कि आज समाज में एक विडंबना दिखाई देती है कि व्यक्ति दूसरों के प्रति सहानुभूति और सहयोग का भाव तो रखता है, लेकिन अपने ही परिवार के सदस्यों के प्रति अपेक्षित प्रेम और संवेदनशीलता नहीं दिखा पाता।

मुनिश्री ने प्रेरित किया कि परिवार में प्रेम, सम्मान, सहयोग और संवाद का वातावरण बनाना प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है। जब अपने ही अपनों की जरूरतों और भावनाओं को समझना बंद कर देते हैं, तब रिश्तों में दूरियां और जीवन में तनाव बढ़ने लगता है। परिवार में शांति स्थापित करने के लिए जरूरी है कि व्यक्ति दूसरों से अपेक्षा करने से पहले स्वयं अपने व्यवहार में प्रेम और आत्मीयता का संचार करे।

सुख-दुख और मान-अपमान में समभाव ही सज्जनता

इस अवसर पर मुनिश्री संभव कुमार जी ने सज्जनता के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सच्चा सज्जन वही है, जो सम्मान मिलने पर अहंकार से भर न जाए और अपमान होने पर विचलित न हो। धन-संपत्ति की प्राप्ति में अत्यधिक उत्साहित होना और उसके चले जाने पर निराशा में डूब जाना मन की अस्थिरता को दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि जीवन में परिस्थितियां बदलती रहती हैं। कभी सुख मिलता है तो कभी दुख का सामना करना पड़ता है। जो व्यक्ति दोनों स्थितियों में संतुलन बनाए रखता है और मान-अपमान को समभाव से स्वीकार करता है, वही वास्तविक अर्थों में सुखी जीवन जीता है। समभाव व्यक्ति को आंतरिक मजबूती प्रदान करता है और उसे परिस्थितियों का विवेकपूर्ण सामना करने की प्रेरणा देता है।

प्रेक्षाध्यान एवं प्रत्याख्यान के प्रयोगों से आध्यात्मिक वातावरण

कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर शांतिनाथ प्रभु की सुमधुर स्तुति के साथ हुआ। धर्मसभा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को आत्मशोधन की दिशा में प्रेरित करने के लिए प्रेक्षाध्यान एवं प्रत्याख्यान के विशेष प्रयोग भी करवाए गए। इन आध्यात्मिक अभ्यासों के माध्यम से आत्मचिंतन, संयम और मन की एकाग्रता के महत्व को रेखांकित किया गया।

अंत में मंगल संगान एवं मंगल पाठ के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। नवरात्रि आध्यात्मिक अनुष्ठान के शुभारंभ पर दिए गए प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया कि सच्ची शांति और संतोष बाहर की परिस्थितियों को बदलने से ही नहीं, बल्कि अपने भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाने से भी प्राप्त होते हैं।