लाडनूं : जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में शक्ति और साधना के महापर्व नवरात्रि के पावन अवसर पर आज से नवान्हिक आध्यात्मिक अनुष्ठान का शुभारंभ हुआ। इसी के साथ आत्म-रूपांतरण के उपक्रम के रूप में प्रेक्षाध्यान शिविर तथा योगक्षेम वर्ष प्रवास के अंतर्गत सघन साधना शिविर के द्वितीय चरण का भी आज से मंगल प्रारंभ हुआ। पूज्य प्रवर ने दोनों शिविरों के संभागियों को पावन उपसंपदा प्रदान की।
आज के कार्यक्रम में भारत जैन महामंडल के पदाधिकारियों ने भी गुरु चरणों में भावभीनी उपस्थिति दर्ज कराकर पूज्य आचार्य श्री से मार्गदर्शन एवं पावन आशीर्वाद प्राप्त किया।
मंगल देशना में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने कहा – साधना की दो पद्धतियाँ रही हैं, एक एकाकी साधना और दूसरी सामुदायिक साधना। प्राचीन काल में व्यवस्था थी कि साधु अकेला विचरण करता है, अपनी साधना करता है। वह साधना कठिन भी हो सकती है। यह सहाय प्रत्याख्यान है कि किसी दूसरे साधु का सहयोग न लेकर अकेला विचरण करना भी साधना का एक आयाम है। वर्तमान में विशेषतया हमारे जैन श्वेतांबर तेरापंथ में सामुदायिक साधना पद्धति है, संघबद्ध रहकर साधना करना। कभी-कभी योग्यता के अभाव में एकाकी साधना की बात सोचना लेने के देने पड़ने जैसी स्थिति बन सकती है। आगम के परिप्रेक्ष्य में सहाय प्रत्याख्यान से जीव एकत्व भाव को प्राप्त होता है तथा अल्प शब्द, अल्प कषाय और संयम-बहुल होकर समाधिस्थ रहता है।
गुरुदेव ने आगे फरमाया कि सामुदायिक परिप्रेक्ष्य में सहाय प्रत्याख्यान को इस चिंतन के साथ लें कि संघ में रहते हुए भी साधक यथासंभव दूसरों पर आलंबित न रहे, परावलंबन में न जाए और अपना कार्य स्वयं करे। अपना प्रतिलेखन, वस्त्र प्रक्षालन या अन्य छोटे-मोटे कार्य स्वयं किए जाएँ, दूसरों को परिश्रम न दिया जाए। सर्वं परवशं दुःखं, सर्वं आत्मवशं सुखम् अर्थात् परवश होना दुःख है और आत्मवश रहना ही सुख है। व्यक्ति में श्रम से जी चुराने की वृत्ति नहीं बननी चाहिए। कार्य निर्जरा के उद्देश्य से करें और पूर्णतः स्वावलंबी बनें। परिश्रमी जीवन की यह अपेक्षा है कि साधक स्वयं श्रम करे, कम से कम सेवा ले और अधिक सेवा दे। गण में रहते हुए भी निर्द्वंद्व रहकर अपने आप में लीन रहना आवश्यक है। साथ में रहने से मोह या राग उत्पन्न हो सकता है, जैसे गौतम स्वामी का भगवान महावीर के साथ चिर संसर्ग भी एक समय साधना में बाधक बना था। जब तक वह राग नहीं छूटेगा, तब तक केवलज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है।
कार्यक्रम में अखिल भारतीय खंडेलवाल दिगंबर जैन सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं भारत जैन महामंडल के पूर्व अध्यक्ष श्री के. सी. जैन, उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) के पूर्व न्यायाधीश श्री के. के. तातेड़, भारत जैन महामंडल के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री श्री ख्याली लाल तातेड़, महामंत्री श्री बाबूलाल बाफना ने अपने विचार व्यक्त किए।








