जयपुर : मनुष्य ने विज्ञान को साधा था ताकि जीवन सरल हो, समय बचे और सुविधाएं बढ़ें। किंतु आज स्थिति ऐसी बनती जा रही है कि साधन ही साध्य बन गया है। जिस मोबाइल को मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए बनाया, वही धीरे-धीरे उसके समय, विचार और व्यवहार का संचालक बनता जा रहा है। उंगलियां स्क्रीन पर चल रही हैं और मनुष्य अपने ही भीतर से दूर होता जा रहा है।
यह केवल तकनीक के बढ़ते प्रभाव की कहानी नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के क्षरण की चिंता भी है। मालवीय नगर स्थित अणुविभा केन्द्र के महाप्रज्ञ सभागार में शनिवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए जैन मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने इसी चिंता को स्वर दिया। उन्होंने कहा, “आज बच्चों का जीवन मोबाइल में कैद हो चुका है। इससे समाज का भविष्य संकट में है। इससे भी अधिक चिंता का विषय यह है कि आज का मानव मोबाइल से मानवता को छोड़ दानवता की ओर बढ़ रहा है। साइबर अपराध इसी का परिणाम है।”
सुविधा से संस्कार तक की यात्रा आवश्यक
मोबाइल अपने आप में समस्या नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब साधन मनुष्य के विवेक पर अधिकार कर ले। मुनिश्री ने कहा कि भावी पीढ़ी को मोबाइल-मुक्त अथवा मोबाइल-संयमित जीवन का प्रशिक्षण देना अब केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज के सामने खड़ी आवश्यकता है।
मोबाइल के अतिरेक ने बच्चों की दिनचर्या, स्वास्थ्य और अध्ययन को प्रभावित किया है। उनकी प्रतिभा और योग्यता का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा। जिस समय में उन्हें अपने व्यक्तित्व, विचार और चरित्र का निर्माण करना चाहिए, वह समय स्क्रीन पर बीत रहा है। परिणामस्वरूप अनेक बच्चे अपनी क्षमता के अनुरूप सफलता प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं।
मुनिश्री ने डिजिटल डिटॉक्स को समय की आवश्यकता बताते हुए कहा कि इस दिशा में व्यापक स्तर पर कार्य करने की जरूरत है। नई पीढ़ी को यह समझाना होगा कि जीवन की वास्तविक अनुभूतियां किसी स्क्रीन पर उपलब्ध नहीं होतीं। परिवार का स्नेह, गुरु का मार्गदर्शन, प्रकृति का सान्निध्य और आत्मचिंतन—ये सभी मनुष्य को भीतर से समृद्ध करते हैं।
मोबाइल की सुविधा के साथ संयम भी जरूरी
मुनिश्री संभव जी महाराज ने कहा कि “मोबाइल सुविधाएं देता है तो दुविधाएं भी पैदा करता है।” सुविधा और संकट के बीच अंतर केवल संयम का है। यदि मोबाइल का उपयोग विवेक के साथ किया जाए तो वह उपयोगी साधन है, लेकिन जब वही जीवन का केंद्र बन जाए तो दुविधाएं जन्म लेने लगती हैं।
उन्होंने कहा कि समाज के कर्णधारों को डिजिटल डिटॉक्स के विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। भावी पीढ़ी को केवल तकनीकी दक्षता देना पर्याप्त नहीं है; उसे स्क्रीन संयम, आत्मअनुशासन और जीवन-मूल्यों का संस्कार देना भी उतना ही आवश्यक है। तकनीक हाथ में रहे, मन पर नहीं—यही संतुलन भविष्य की सुरक्षा का आधार बन सकता है।
धर्म और विज्ञान का समन्वित संदेश
धर्मसभा में तत्त्वज्ञान के साथ स्वास्थ्य विज्ञान से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां भी प्रदान की गईं। यह संदेश भी उभरा कि भारतीय चिंतन में संयम केवल धार्मिक साधना नहीं, बल्कि स्वस्थ और संतुलित जीवन की आधारभूमि है।
कार्यक्रम का प्रारंभ तीर्थंकर भगवान सुमति प्रभु के भक्तिगीत से हुआ। इस अवसर पर आचार्य तुलसी द्वारा रचित गेय आख्यान ‘भरत मुक्ति’ का विवेचन भी किया गया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।
आज आवश्यकता मोबाइल छोड़ देने की नहीं, बल्कि मोबाइल के मोह से मुक्त होने की है। क्योंकि तकनीक मनुष्य को आधुनिक बना सकती है, लेकिन उसे संवेदनशील, संयमी और मानवीय बनाने का कार्य संस्कार ही करते हैं।
मनुष्य की असली प्रगति उसकी स्क्रीन की चमक में नहीं, उसके अंतर्मन के प्रकाश में है।








