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नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती के अवसर पर उनके जीवन, दृष्टि और राष्ट्र के प्रति उनके योगदान को रेखांकित करते हुए एक विचारोत्तेजक लेख लिखा है। यह विशेष लेख सोमवार को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल द्वारा साझा किया गया।
“भारत की एकता और प्रगति के लिए समर्पित जीवन” शीर्षक वाले इस आलेख में प्रधानमंत्री ने डॉ. मुखर्जी के शिक्षा, उद्योग, मानवीय सेवा और राष्ट्रीय एकीकरण में योगदान को विस्तार से स्मरण किया है। पीएम मोदी ने उन्हें “साहस और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण” वाला नेता बताते हुए कहा कि उनका जीवन विद्वता, जनसेवा और नैतिक मूल्यों का अद्वितीय संगम था।
प्रधानमंत्री ने उल्लेख किया कि समृद्ध परिवार से होने के बावजूद डॉ. मुखर्जी ने व्यक्तिगत त्रासदियों—युवा पुत्र और बाद में पत्नी की मृत्यु—के बावजूद स्वयं को पूरी तरह राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने लिखा कि इन कठिनाइयों ने उनके संकल्प को और अधिक दृढ़ किया।
पीएम मोदी ने विभाजन के समय भारत की एकता की रक्षा में डॉ. मुखर्जी की भूमिका का विशेष उल्लेख किया और कहा कि जम्मू-कश्मीर को लेकर उनके विचारों और संघर्ष को बाद में अनुच्छेद 370 और 35ए की समाप्ति के रूप में ऐतिहासिक मान्यता मिली। प्रधानमंत्री ने लिखा कि जेल और नजरबंदी भी उन्हें अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकी।
प्रधानमंत्री ने डॉ. मुखर्जी की शिक्षा संबंधी दृष्टि को भी रेखांकित किया और उन्हें कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति के रूप में उनके योगदान की याद दिलाई। उन्होंने डॉ. मुखर्जी के विचार उद्धृत करते हुए लिखा कि शिक्षा संस्थानों का उद्देश्य केवल क्लर्क या कम वेतन वाले कर्मचारी तैयार करना नहीं, बल्कि नेतृत्व क्षमता वाले युवा तैयार करना है।
औद्योगिक विकास के क्षेत्र में योगदान का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि स्वतंत्र भारत की कई प्रारंभिक परियोजनाओं—जैसे दामोदर घाटी निगम और सिंदरी उर्वरक संयंत्र—की नींव में डॉ. मुखर्जी की भूमिका रही। साथ ही उन्होंने हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों को भी प्रोत्साहन दिया।
पीएम मोदी ने उन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों में दृढ़ आस्था रखने वाला नेता बताते हुए कहा कि उन्होंने राष्ट्रहित में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट से इस्तीफा भी दिया था। उन्होंने आपातकाल और 42वें संविधान संशोधन का भी उल्लेख करते हुए कांग्रेस की नीतियों पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी की।
बंगाल के 1943 के अकाल और 1942 के मेदिनीपुर चक्रवात के दौरान डॉ. मुखर्जी की मानवीय सेवाओं को याद करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि करुणा उनके सार्वजनिक जीवन का केंद्रीय तत्व था।
लेख के अंत में डॉ. मुखर्जी का संदेश उद्धृत किया गया—“जो भी कार्य करो, उसे पूरी गंभीरता, समर्पण और ईमानदारी से करो। किसी भी कार्य को अधूरा मत छोड़ो।”
प्रधानमंत्री ने युवाओं से उनके आदर्शों को आगे बढ़ाने का आह्वान करते हुए कहा कि डॉ. मुखर्जी को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब भारत एक “मजबूत, एकजुट, आत्मविश्वासी और संवेदनशील राष्ट्र” के रूप में ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य की ओर अग्रसर होगा।
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