नई दिल्ली: आरक्षण को लेकर देश में जारी बहस के बीच केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि यदि देश से जातिवाद और जातिगत भेदभाव पूरी तरह खत्म हो जाए तो वह आरक्षण छोड़ने के लिए तैयार हैं। आठवले ने कहा कि जब तक समाज में जाति के आधार पर भेदभाव कायम है, तब तक आरक्षण की जरूरत बनी रहेगी।
आठवले ने कहा कि आरक्षण केवल सरकारी नौकरियों या शिक्षा में अवसर देने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समानता और वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाने का माध्यम भी है। उनके मुताबिक, समाज में बराबरी की स्थिति आने के बाद ही आरक्षण की आवश्यकता पर विचार किया जा सकता है।
जातिगत भेदभाव खत्म करने पर जोर
केंद्रीय मंत्री ने आरक्षण का विरोध करने वालों के संदर्भ में कहा कि पहले देश से जातिवाद समाप्त करने की दिशा में काम होना चाहिए। उनका तर्क है कि जब तक किसी व्यक्ति के साथ उसकी जाति के आधार पर भेदभाव होता रहेगा, तब तक आरक्षण को खत्म करने की मांग का कोई औचित्य नहीं है।
उन्होंने कहा कि संविधान में आरक्षण का प्रावधान सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को समान अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया है। इसलिए इस व्यवस्था को सामाजिक परिस्थितियों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
आरक्षण पर बहस फिर तेज
आरक्षण की सीमा, इसकी समीक्षा और इसके आधार को लेकर राजनीतिक दलों के बीच लंबे समय से बहस होती रही है। विभिन्न वर्गों की ओर से आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की मांग भी समय-समय पर उठती रही है।
ऐसे समय में आठवले का बयान इस बहस को एक अलग दिशा देता है। उन्होंने आरक्षण को जातिगत असमानता से जोड़ते हुए स्पष्ट किया कि सामाजिक भेदभाव समाप्त होने की स्थिति में आरक्षण की जरूरत पर पुनर्विचार किया जा सकता है।
आठवले का यह बयान ऐसे समय आया है जब आरक्षण को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस लगातार जारी है।








