डेस्क : केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जलवायु परिवर्तन को लेकर यूरोपीय देशों की जिम्मेदारी पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों पर वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का बोझ डालते समय विकसित देशों के ऐतिहासिक उत्सर्जन और उनकी आर्थिक प्रगति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
जर्मनी में बर्लिन ग्लोबल डायलॉग के दौरान गोयल ने यूरोपीय संघ की कार्बन सीमा समायोजन व्यवस्था (CBAM) को लेकर चिंता जताई। इस व्यवस्था के तहत कुछ आयातित वस्तुओं पर उनके उत्पादन से जुड़े कार्बन उत्सर्जन के आधार पर लागत निर्धारित की जाती है।
वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी का मुद्दा
पीयूष गोयल ने भारत की आबादी और वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उसकी हिस्सेदारी का उल्लेख करते हुए कहा कि विकासशील देशों के साथ जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर न्यायसंगत व्यवहार होना चाहिए।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विकसित देशों ने औद्योगिक विकास के दौरान लंबे समय तक कार्बन उत्सर्जन किया है। ऐसे में जलवायु नीतियां बनाते समय उनकी ऐतिहासिक जिम्मेदारी को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
भारत जैसे विकासशील देशों के सामने आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और करोड़ों लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने की चुनौती है। इसलिए जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपायों में इन परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
जलवायु वित्त और तकनीक हस्तांतरण पर जोर
गोयल ने विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दी जाने वाली वित्तीय सहायता के मुद्दे को भी उठाया। विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा अपनाने, आधुनिक तकनीक विकसित करने और उत्सर्जन कम करने के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता है।
उन्होंने इस संदर्भ में जलवायु वित्त और तकनीक हस्तांतरण के महत्व पर जोर दिया। भारत का पक्ष रहा है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी साझा होनी चाहिए और विकासशील देशों को अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक सहायता मिलनी चाहिए।
यूरोप के कार्बन टैक्स से उद्योगों पर असर की आशंका
केंद्रीय मंत्री ने यूरोपीय संघ की कार्बन संबंधी व्यापार नीतियों और इस्पात आयात पर लागू अलग-अलग प्रतिबंधों के संभावित आर्थिक प्रभावों पर भी चिंता जताई।
कार्बन से जुड़ी अतिरिक्त लागत का असर इस्पात, एल्युमीनियम और सीमेंट जैसे औद्योगिक उत्पादों पर पड़ सकता है। इससे निर्माण, बुनियादी ढांचे और विनिर्माण क्षेत्र की लागत प्रभावित होने की आशंका है।
यूरोपीय संघ की कार्बन सीमा समायोजन व्यवस्था का उद्देश्य कुछ आयातित वस्तुओं से जुड़े कार्बन उत्सर्जन की लागत को ध्यान में रखना है। इसकी अंतिम व्यवस्था 1 जनवरी 2026 से लागू हुई। यह व्यवस्था इस्पात आयात पर लागू अन्य व्यापारिक प्रतिबंधों से अलग है।
विकास के साथ स्वच्छ ऊर्जा की चुनौती
पीयूष गोयल ने भारत के विकास और ऊर्जा जरूरतों के संदर्भ में जलवायु नीति को देखने की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत के सामने 140 करोड़ से अधिक लोगों की ऊर्जा, भोजन और अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ने की चुनौती है।
भारत का मानना रहा है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विकसित और विकासशील देशों की अलग-अलग आर्थिक परिस्थितियों को समझना जरूरी है। स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ते हुए विकासशील देशों को आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
पीयूष गोयल के इन बयानों के बाद जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी, विकसित देशों की वित्तीय प्रतिबद्धताओं और कार्बन आधारित व्यापार नीतियों के विकासशील देशों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर बहस फिर चर्चा में आ गई है।









