संयुक्त राष्ट्र में भारत की हुंकार, सुरक्षा परिषद के पुनर्गठन की मांग

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डेस्क :  भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में व्यापक, सार्थक और समयबद्ध सुधारों की मांग करते हुए कहा है कि परिषद की मौजूदा संरचना आज की भू-राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप होनी चाहिए। भारत का कहना है कि दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में से एक की व्यवस्था अब भी वर्ष 1945 की परिस्थितियों के आधार पर नहीं चल सकती।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में सुरक्षा परिषद में समान प्रतिनिधित्व और सदस्य संख्या बढ़ाने के मुद्दे पर भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत परवथनेनी हरीश ने कहा कि परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, प्रभावी और विश्वसनीय बनाने के लिए स्थायी और अस्थायी, दोनों श्रेणियों में सदस्यों की संख्या बढ़ाना आवश्यक है।

हरीश ने कहा, “कोई युद्ध, विशेषकर 80 वर्ष से भी पहले हुआ युद्ध, आज की दुनिया की स्थिति निर्धारित नहीं करना चाहिए।” उन्होंने जोर दिया कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय की परिस्थितियां वर्तमान वैश्विक व्यवस्था का एकमात्र आधार नहीं हो सकतीं।

विश्व युद्धों में भारत के योगदान का किया उल्लेख

सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा किए गए अपने वक्तव्य में हरीश ने दोनों विश्व युद्धों के दौरान भारत के योगदान और विशेष रूप से द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीयों के बलिदान को याद किया।

उन्होंने बताया कि द्वितीय विश्व युद्ध में लगभग 25 लाख भारतीयों ने हिस्सा लिया था, जिनमें करीब 90 हजार ने सैन्य सेवा के दौरान अपने प्राण गंवाए। उन्होंने बंगाल के अकाल का भी उल्लेख किया और कहा कि औपनिवेशिक शासन की युद्धकालीन नीतियों के प्रभावों के बीच 40 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हुई थी।

भारतीय राजदूत ने मौजूदा वैश्विक शासन व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि सुरक्षा परिषद की वर्तमान संरचना उन देशों के अनुभवों और चिंताओं को पर्याप्त स्थान नहीं देती, जो द्वितीय विश्व युद्ध के विजेता देशों में शामिल नहीं थे।

उन्होंने कहा कि बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में परिषद को व्यापक वैश्विक दृष्टिकोण को प्रतिनिधित्व देना होगा, ताकि उसकी प्रासंगिकता बनी रहे।

15 वर्षों से अधिक समय से जारी वार्ता पर भारत ने जताई चिंता

सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर चल रही अंतर-सरकारी वार्ता (IGN) की धीमी गति पर भी भारत ने चिंता जताई। हरीश के अनुसार, यह प्रक्रिया 15 वर्षों से अधिक समय से चल रही है, लेकिन अब तक न तो औपचारिक वार्ता-पाठ तैयार हुआ है, न कोई स्पष्ट समयसीमा तय हुई है और न ही परिणाम का निर्धारण हो पाया है।

उन्होंने कहा, “यह वार्ता नहीं है, बल्कि यथास्थिति को बनाए रखने की प्रक्रिया है।”

हरीश ने वार्ता के सह-अध्यक्षों से मौजूदा ‘एलिमेंट्स पेपर’ से आगे बढ़कर एक औपचारिक वार्ता-पाठ तैयार करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि इस दस्तावेज में सदस्य देशों के विभिन्न विचारों और प्रस्तावों को शामिल किया जाना चाहिए।

भारत ने स्पष्ट किया कि सुधार प्रक्रिया में केवल अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना पर्याप्त नहीं होगा। स्थायी और अस्थायी, दोनों श्रेणियों में विस्तार किया जाना चाहिए।

एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को मिले अधिक प्रतिनिधित्व

भारत ने एक बार फिर कहा कि एशिया-प्रशांत, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों को सुरक्षा परिषद में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है।

हरीश ने कहा कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में दुनिया की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी रहती है, लेकिन सुरक्षा परिषद में इस क्षेत्र का केवल एक स्थायी सदस्य है। भारत ने इसे मौजूदा व्यवस्था में असंतुलन का प्रमुख उदाहरण बताया।

भारतीय पक्ष के अनुसार, केवल अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने से मूल समस्या का समाधान नहीं होगा। इससे परिषद में पहले से मौजूद शक्ति-संतुलन की स्थिति बनी रह सकती है।

भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद के व्यापक पुनर्गठन की वकालत करता रहा है। उसका तर्क है कि परिषद की संरचना में वर्तमान जनसंख्या, आर्थिक क्षमता और भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को उचित स्थान मिलना चाहिए।

वीटो अधिकार पर भी भारत का स्पष्ट रुख

वीटो अधिकार के विवादित मुद्दे पर भारत ने अपना रुख दोहराया कि यदि वीटो व्यवस्था जारी रहती है, तो सुधारों के तहत शामिल होने वाले नए स्थायी सदस्यों को भी यह अधिकार दिया जाना चाहिए।

हरीश ने कहा कि स्थायी सदस्यों के बीच विशेषाधिकारों में असमानता बनाए रखना समानता के उस सिद्धांत को कमजोर करेगा, जिसे सुधार प्रक्रिया आगे बढ़ाना चाहती है।

इसके साथ ही भारत ने सुरक्षा परिषद के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत के सुझावों में संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में सैनिक और पुलिस बल भेजने वाले देशों को अधिक प्रतिनिधित्व देना, परिषद के कार्यादेशों की नियमित समीक्षा करना और निर्णय लेने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना शामिल है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र से भारत को उम्मीद

भारत ने चेतावनी दी कि सुधारों में लगातार हो रही देरी संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा रही है। मौजूदा संघर्षों और उभरती अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा चुनौतियों के बीच संगठन को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाने की जरूरत है।

हरीश ने कहा कि आज की दुनिया अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से समानता, अधिकारों की रक्षा और वास्तविक सहयोग की अपेक्षा करती है। इसलिए वैश्विक संस्थाओं को अतीत की राजनीतिक परिस्थितियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

भारत ने बहुपक्षीय व्यवस्था के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि वह सार्थक सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए अन्य सदस्य देशों के साथ रचनात्मक सहयोग जारी रखेगा।

भारत को उम्मीद है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में इस दिशा में ठोस प्रगति होगी और सुधार प्रक्रिया को औपचारिक वार्ता-पाठ, स्पष्ट समयसीमा तथा निर्धारित लक्ष्य मिल सकेंगे।

भारत की यह मांग एक बार फिर इस बात को रेखांकित करती है कि 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को अधिक समावेशी, प्रतिनिधित्वपूर्ण और प्रभावी बनाना आवश्यक है।